कागद राजस्थानी

मंगलवार, 31 मई 2011

राजस्थानी भाषा : विद्वानों रा विचार

राजस्थानी भाषा : विद्वानां रा विचार





+"इण लोक्तंत्र में जठै ऐक भारत रै भीतर ओ सई है कै
अलेखूं भाषावां है अर हर भाषा री आपरी संस्कृति है ।
इणी राजस्थान में म्है विश्वविद्यालय  में राजस्थानी नै
जागा दिरावण खातर कौसिस करी ही । म्हनै खुशी है
कै जोधपुर विश्वविद्यालय राजस्थानी नै जागा दीवी ।
विणरै पछै बाकी विश्वविद्यालयां जागा दीवी । इण
सारू लोग कैंवता हा कै राजस्थानी रै बढण सूं हिन्दी
रो अहित होवैला । म्हैं कै’यो जका राजस्थान्यां हिन्दी
नै उत्पन्न करी,आदिकाल उठै ऊं ई सरू होवै ।
बा हिन्दी रा विरोधी कीकर होय सकै ? इण सारू
जितरी बोलियां है,जित्यरी भाषावां है,सतदल कमल रै समान है ।"
                                       
* डा.नामवर सिंह,प्रख्यात आलोचक,जे.एन.वी.-दिल्ली
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"आपां नै आ बात साफ़-साफ़ समझ लेवणी चाईजैकै आपां
बंगला,मराठी,गुजराती,तेलगू,कन्नड़,मलयालम, अर राजस्थानी
इत्यादि सगळी प्रांतीय भाषावां री तरक्की चावां । हर प्रांत
 में उठै री भाषा नै प्रथम ठौड़ है । हिन्दी कै हिन्दुस्तानी
राष्ट्रभाषा ज़रूर है अर होवणी भी चाईजै पण उणरो नम्बर
प्रांतीय भाषावां रै बाद में है ।" 

* पंडित जवाहर लाल नेहरू,प्रथम प्रधानमंत्री,भारत
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" जे राजस्थानी जिसी दो च्यार भाषावां प्रतिष्टित होय
जावै तो इण में कोई आशंका कै डर री बात कोनी है ।
राजस्थानी जनता आपरी अचेत सी आत्मा नै फ़ेरूं
सरजीवण करणो चावै । इण सूं पूरै भारत नै लाभ पूगसी
अर राष्ट्रीय एकता नै कोई नुकसाण नीं पूगसी !"

* डा, सुनीति कुमार चाटुर्ज्या, लिंग्विष्टिक सर्वे
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" राजस्थानी एक स्वतंत्र भाषा रै रूप में विकसित होयसी
अर बखत आयां राष्ट्र रै संविधान में सवतंत्र रूप सूं थोड़
पायसी ।जे राजस्थान पूरै नै जागृत करणौ है तो
राजस्थानी भाषा रै माध्यम सूं ई लोगां में जागृति
पैदा करणी पड़सी ।"

* काका कालेकर
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 " राजस्थानी नै मानता मिलै,इण रो विकास होवै,इण री
जरूरत सदैव ई रैई है ।पण अफ़सोस री बात है कै इण
क्षेत्र में कोई ठोस काम आजे तक कोनीं होयो ।म्हैं इण
बात सूं सहमत हूं कै प्रांतीय भाषावां रै विकास सूं राष्ट्रीय
 भाषा हिन्दी रो कोई नुकसान नीं हुवै ,बलकै उण रो मान
ई दधै ।राजस्थानी भाषा नै संरक्षण देयां हिन्दी रो सबद
भंडार बधै ई है ।"
  
* पं.नवलकिशोर शर्मा,पूर्व केन्द्रीय मंत्री अर महामहिम राज्यपाल
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"राजस्थानी भाषा नै आठवीं अनुसूची में राखणो ई चाईजै ।
आ म्हारी मानता है ।पण साथै ई म्हैं मानू कै संविधान रै
अनुछेद 345 में जिकी सत्ता राजस्थान री विधानसभा नै
 हासिल है,उणरो ई ईमानदारी सूं इस्तेमाल करणो चाईजै ।"
  
* डा. लक्ष्मीमल सिंघवी,जगचावा विधिवेता
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" राजस्थान री अदालतां में राजस्थानी भाषा रो प्रवेश कोनीं ।
इण सूं न्याव करण री प्रक्रिया में घणी अबखाईयां आवै ।
अदालत में फ़रीक जिण भाषा में बोलै,उण भाषा में इज
लिखीजणो चाईजै । नीं तो बयानां री प्रमाणिकता नीं रैवै ।"
  
* श्री गुमानमल लोढा़,तत्कालीन न्यायाधीष,राजस्थान उच्च न्यायालय
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"राजस्थानी भाषा घणी स्मृद्ध अर जूनी जनवाणी है ।
इण भाषा रा लेखक आपणै देश अर समाज नै नूंई
दिशा देय सकै । म्हानै राजस्थानी भाषा , साहित्य
अर संस्कृति माथै गरब है ।"


* प्रो. वासुदेव देवनानी,पूअव शिक्षा मंत्री,राजस्थान
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"राजस्थानी भाषा नै मानता अर उण नै प्रादेशिक भाषा
रै पद माथै बैठावणो, ऐ दोनूं काम बाकी है,जिका आपां
 सगळां नै मिल’र करणां है ।"


* ह्री मोहन लाल सुखाडि़या,पूर्व मुख्यमंत्री,राजस्थान
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" हिन्दी म्हारी राष्ट्र भाषा है,म्हे उण रो प्रचार करांला !
संस्कृत आपणी प्राचीनतम भाषा है, म्हे उण साम्ही माथो
झुकावांला अंग्रेजी आपां री अंतर्राष्ट्रीय भाषा अर कीं
अरथां में अंतरप्रांतीय भाषा है ,म्हे उण रो ई उपयोग
करांला,पण जठां तांईं राजस्थान रो सम्बन्ध है ,

राजस्थानी भाषा ईम्हांणी मातृभाषा है ,उणरो  उपयोग
अर प्रचार करणो खुद रो उतरो ई अधिकार समझां
जितरो दूजा प्रांत आपरी भाषावां नै अपणावण अर
फ़ैलावण में राखै ।"

* श्री जयनारायण व्यास,पूर्व मुख्यमंत्री,राजस्थान
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" आज राजस्थान रा लोग राजस्थानी भाषा री संवैधानिक
मानता री बात उठावै । ज़रूर राजस्थानी भाषा नै संवैधानिक
मानता मिलणी चाईजै । इण नै संविधान री आठवीं अनुसूची
में सामल करीजणी चाईजै । म्हनै तो इण में बिलकुल ई
ऐतराज आळी कोई बात कोनी लागै ।"

* श्री वसंत साठे,पूरव केन्द्रीय सूचना एवम प्रसारण मंत्री,भारत-मई १९८१
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" राजस्थानी भाषा एक भोत सिमरिद्ध भाषा है ,जिकी कै
देश प्रेम सिखावै । इण नै मानता मिलै तो हिन्दी नै इण सूं
कोई नुकसाण कोनी होवै , बनिस्पत राजस्थानी भाषा रै विकास सूं
हिन्दी ई नीं,पूरै विश्व साहित्य नै बधापो मिलसी । म्हैं मन सूं चावूं कै
राजस्थानी भाषा नै संवैधानिक मानता मिलणी ई चाईजै । संसद्व में
जद राजस्थानी भाषा नै संवैधानिक मानता रो विधेयक आयो तो
म्हैं अर म्हारी पार्टी रा लोग इण रो पूरो समर्थन करस्यां ।"

* श्री अटलबिहारी वाजपेयी सांसद,फ़रवरी-१९८४
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"राजस्थानी भाषा नै संवैधानिक मानता मिलणी ई चाईजै । आ भाषा
संवैधानिक री हकदार है । आ तो राजस्थान्यां री गळती रैई कै
वै इतरा बरस आळस मे सूत्या रैया ।राजस्थानी भाषा घणी जूनी अर
सिमरध भाषा है। संसार में प्रचलित अर थापित कई भाषावां रो
जिण बखत नांव ई नीं हो बीं बगत राजस्थानी भाषा फ़ळी फ़ूली
भाषा ही ।अबै कैई राजनैतिक कारणां सूं  इणरा महत्व नै
कम नीं आंकनो चाईजै ।"

* डा. बलराम जाखड़,तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष,मई-१९८३
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"जठै तक राजस्थानी भाषा री मानता में घांदा घालण या
रोडा़ अटकावण री बात है,तो म्हारै विचार में ओ काम वां
लोगां रो है जिका रै स्वार्थां नै ठेस पूगै का आंच आवै ।
 सचिवालय में काम कर रैया अधिकारी सराजस्थानी भाषा
री उपेक्षा करै तो आ बात ठीक कोनीं । उणां नै आपरै
 इण रवैयै में बदळाव ल्यावणो चाईजै,जिण सूं कै हिन्दी
 रो ई भलो होयसी ।"

* श्री कमलेश्वर,साहित्यकार-पत्रकार,जुलाई-१९८७
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"म्हैं तो राजस्थानी भाषा रै पगस में हूं । ऐकबार डा. करणी सिंह जी
लोकसभा में मुद्दो उठायो ई हो , पण बात किणीं कारण सूं बैठी कोनी।
खैर,भविस में जद ई राजस्थानी भाषा रो मुद्दो उठैला तो राजस्थानी भाषा
सारू राजस्थान्यां रो पगस लेवांला ।"

* श्री लाल कृष्ण अडवाणी,अध्यक्ष भाजपा,अक्टूबर-१९८७
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" भाषा रै आधार पर प्रांत बण्या ,पण राजस्थान्यां  सागै
न्याय नीं होयो ।राजस्थानी भाषा रै आधार पर प्रांत रो
नांव राजस्थान थरप दियो  पण  अठै- रै लोगां रै मुंडा माथै
पाटी बांध दी । आज राजस्थान आपरी भाषा री संवैधानिक
मानता रै कारण अबोलो है । भाषा री मानता रै अभाव में ई
सरकार अर जनता में संवादहीणता है । प्रांत बेरोजगारी
री मार झेल रैयो है। राजस्थानी भाषा री राज मानता
 अर प्रारम्भिक शिक्षा में होयां बिना राजस्थान रै विकस री
कल्पना नीं होय सकै ।"

* डा.रामप्रताप,पूर्व खाद्यमंत्री,राजस्थान,३ मार्च २००३
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" आज राजस्थान रा लोग राजस्थानी भाषा री राज मानता
री बात उठावै ।ज़रूर राजस्थानी भाषा नै संवैधानिक मानता
मिलणी चाईजै।इण नै संविधान री आठवीं अनुसूची में सामल
करीजणी चाईजै ।म्हनै तो इण में बिलकुल ऐतराज वाळी
बात कोनीं लागै ।"

* वसंत साठे ,पूर्व केन्द्रीय सूचना एवम प्रसारण मंत्री,भारत-मई १९८१
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" सै सूं पैली तो राजस्थान सरकार कानीं सूं राजस्थानी भाषा
नै मानता मिलणी चाईजै ।पछै विद्यालयां में इणरै पढण री
व्यवस्था होवणी चाईजै ।"

* श्री प्रभाकर माचवै,साहित्यकार,जून १९८३
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" गोबिल्स रो कैणो है कै ऐक झूठ ने सौ दफ़ा दोहराओ तो बो झूठ नीं रै कर साच बणजासी ! आम मिनख उण नै साच मानणो चालू कर देगो ।राजस्थानी रै सागै यो ही होयो है । लारलै ५० बरसा सैं एक झूठ फ़ैलायो गयो-राजस्थानी भाषा, भाषा नहीं- बोली है ।अर आम मिनख ईं पर बिसवास कर बैठ्यो ।प्रचार इत्तो प्रभावशाली रैयो कै कुछ राजस्थानी भी ओ झूठ बोलण लागग्या ।भाषा अर साहित्य रो ही नहीं , अपणै समाज रो भी  ईं सैं घणो नुकसान होयो । जरूरी है कै राजस्थानी समाज हकीकत नै समझै । आपणै राजस्थान में एक कहावत चालै कै -  बिना बेटां री मा रुळती फ़िरै । गांव ईं सारू कोई नै दोस नीं देवै , कैवै कै ईं रो तकदीर ही खराब है । पण जीं रा बेटा सावळ हुवै,उणां री मा  जे रुळती फ़िरै तो ओळमो बेतां रै सिर जावै-गांव कैवै कै इण खातर जण्या हा के ? आपणी स्थिति जीवण बणावण हाळी मायड़ भाषा रै संदर्भ में मोटा-मोटी ईं तरै ही है । प्रयास है कै आपां आपणी मायड़ भाषा राजस्थानी रै बारै में फ़ैलायोडै भरम री असलीयत नै जाणां। जाणां कै आपणी भाषा घणी समृद्ध है। जाणां कै इण नै संवैधानिक मान्यता क्यूं मिलणी चाये ? जाणां कै आपां नै के काम करणां है ? सामूहिक प्रयास करां-प्रजातंत्र है ,इण में सगळा संगठित हुय’र प्रेसरग्रुप बणावां , जद ही बात ढर्रै आवैगी । "
"दुनियां री करीब-करीब सारी भाषा में एकरूपता जद ई आई ,जद बा राज री,शिक्षा री अर धर्म-ग्रंथां री भाषा बणीं ।गुजराती भाषा खातर महात्मा गांधी जी यो फ़रमान निकाळ्यो थो कै-"हवै पछी कोई ने स्वेच्छाए जोड़नी करवा नो अधिकार नथी । "
[इसके पश्चात किसी को स्वेच्छा से वर्तनी बनाने का अधिकार नहीं है ।]

{सूत्र-सार्थ गुजराती जोड़नी कोष-प्रकाशित सन १९२९ रो पैलो पान्नो }

* रतन शाह , उद्यमी-कोलकाता
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"  इस अनमोल साहित्य की रक्षा करना  प्रत्येक  राजस्थानी ही नहीं ,प्रत्येक भारतीय का पुनीत कर्तव्य है।   मैं गीतांजली लिख सकता हूं , डिंगल के दूहे जैसी काव्य रचना नहीं कर सकता । इसका कारण है-आज वह हल्दीघाटी का वातावरण कहां और बिना वातावरण के कवि को प्रेरणा कहां से मिल सकती है । इस लिए तुम्हारा-हमारा,सबका यह कर्तव्य है कि तन से , मन से ,धन से , जैसे भी हो, इस साहित्य को लुप्त होने से बचाया जाए । इसका प्रचार-प्रसार किया जाए ।"सन १९३१"

*  रविन्द्रनाथ टैगोर
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सन १९३१ में राजस्थान में ९१ % लोग बा भाषा बोलै ,जकी संविधान सूं मान्य १४ भाषावां सूं अलग है । १०००० लोगां लारै खाली ८०९ लोग आं १४ भाषावां में बोलै , बाकी ९१९१ लोग कुणसी भाषा बोलै ? निश्च्य ही  राजस्थानी भाषा बोलै ।

* १९६१ में आज़ाद भारत री सरकार रै अधिकारि सूचना पत्र "गजएटियर ओफ़ इंडिया" रा आंकडा़
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" राजस्थानी वीर प्रदेश री वीर भाषा है । राजस्थानी रो साहित्य अमर साहित्य है । जीवण सूं लबालब भरयोडो़ । कुण जाणै इतिहास में उण कित्ता चमत्कार करिया है । सारो संसार उण पर मुग्ध है। संसार रा बडा-बडा विद्वान, अडा-बडा महापुरूष अर बडा-बडा नेता उण री प्रसंसा करता धापै कोनी। मालवीय जी थोडा़ सा नमूना सुण्या हा, सुणतां ई बोल्या -ओ साहित्य आपणां विश्वविद्यालयां में क्यों नी पढा़ईजै?विश्व कवि रविन्द्रनाथ जी इण साहित्य नै आप रै शांतिनिकेतन सूं छपावण री मंसा प्रकत करी ।
उतरादै भारत री भाषावां में राजस्थानी भाषा सै सूं पुराणी भाषा है ।बा बांगला री बडी बैन है।
.....बा राजभाषा ही, लोक-भाषा ही, शिक्षा री भाषा ही, साहित्य री भाषा ही । विक्रम रै उगणीसवैं सैईकै [ विक्रमी संवत-की उन्नीसव ईं सदी]  ताईं राजस्थानी साहित्य रो घणो विकास होयो। बीसवै सईकै[ बीसवीं सदी] में राष्ट्रभाषा हिन्दी राजस्थान में आई । पैली पाठशाला में राजस्थानी पढाई जाती , अबै नवी स्कूलां में राजस्थानी री जाग्यां हिन्दी पढाईजण लागी ।राजस्थानी साहित्य रो विकास बंद तो कोनी पण मंद होग्यो ।शिक्षा संस्थावां अर भाषा री उन्नति रो घणो सम्बन्ध है। लोग जकी भाषा में शिक्षापा वै,बै नै ई बोलै , बै में ई सोचै अर बै में ई साहित्य रचना करै ।
.......शिक्षा री भाषा न्यारी अर जनता री भाषा न्यारी होगी । पढ्योडा़ अर अर जनता में आंतरो पडण लागग्यो । ओ आंतरो दिनूंदिन बधतो ही गयो ।
  
* ठा.रामसिंह जी तंवर, दिनाजपुर-१९९४,अखिल भारतीय राजस्थानी साहित्य सम्मेलन में
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" मेरा निवेदन है कि राजस्थानी भाषा की बडी़ समर्थ परम्परा रही है । जिस भाषा का ऐसा इतिहास रहा हो , जिस भाषा में शौर्य और शृंगार का ऐसा सम्मिश्रण रहा हो, जिस भाषा में अस्मिता की अभिव्यक्ति के लिए ऐसा अवसर मिला हो,उस भाषा को स्वीकार करने के लिए अगर हम यह कहें कि-हम सोचेंगे कि इन भाषाओं को किस प्रकार आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए और किस आधार पर किया जाए तो शायद यह ऐतिहासिक विडम्बना होगी ।"

*डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी,राज्य सभा में -१७ मई २००२
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"राजस्थान राजस्थानी भाषी प्रांत है।हिन्दी इण प्रांत री भाषा कोनी ।....मातृभाषा राजस्थानी है।राजस्थान सदा सूं ई हिन्दी नै राष्ट्रभाषा रै रूप में मानतो अर आदर देतो आयो है पण इण कारण उण नै हिन्दीभाषी मान लेणो सरासर अन्याय है ॥"

* सुमनेश जोशी,साहित्यकार,राजस्थान भाषा प्रचार सभा ,जयपुर [१८-२० मार्च १९६६]
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"राजस्थानी एक समर्थ भाषा है अर आ बात जरूरी है कै उण नै राजस्थान री मातृभाषा रै रूप में मानता दी जावै । "

* हरिभाऊ जी उपाध्याय, साहित्यकार,राजस्थान भाषा प्रचार सभा ,जयपुर [१८-२० मार्च १९६६}
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आज़ादी को ६३ साल हुए ! हम आज़ भी बेज़ुबान हैं ! ऐसा भी नहीं कि हमारी कोई ज़ुबान नहीं ! सब कुछ है !हमारे पास वह ज़ुबान है जिसका लोहा दुनिया मानती है !बस अपनी ज़ुबान में बोलने का अधिकार नहीं !हमारे बच्चॊं को अपनी ज़ुबान में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का भी अधिकार  नहीं ! हमारी ज़ुबान है राजस्थानी !राजस्थानी वह भाषा है जो देश के सब से बडे़ प्रांत की ही नहीं बल्कि सब से बडे़ भूभाग की भी भाषा है ! आईए जानें हमारी राजस्थानी भाषा के बारे में दुनिया के विद्वान/हमारे नेता/हमारे साहित्यकार  क्या कहते हैं :-
 [ कृपया रोज़ाना देखें- विचारों की इस कडी़ को बढा़ता रहूंगा रहूंगा ! आपके पास हों तो आप भी भेजें !]
  
‎"इस चिर युवती या चिरनवीना नक्षत्र रचित रात्रि सी सुन्दरी और गम्भीर भाषा [राजस्थानी] को फ़िर अपने घर की रानी बनाने की चेष्टा हर मरुदेशवासी का फ़र्ज़ है ।भाईयो,अपनी मातृ भाषा राजस्थानी का स्थान फ़िर ऊंचा करो,उससे अपनी उन्नति करो और हृदय का प्रकाश करो !"

[] डा.सुनीति कुमार चाटुर्ज्या,भषा विज्ञानी
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‎"There is an enoumus man of literture in various forms in rajasthani,of considerable historical importance,about which harly anything is known."

*Sir G.A.Griyarson
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‎"Our great provincial languages are not dialects or vernaculars as the ignorant sometimes calls them.They are a rich inheretance,each spoken by many million persons, each tied up inextrically with the life and culture and ideas of the mass...es as well as the upper larg."

*Pt. J.L.Nehru
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"The vast literature flourished all over Rajputana and Gujrat where ever Rajput shed his blood."

*Dr.L.P.Tessitorry
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"शिक्षा मातृभाषा के द्वारा ही होनी चाहिए,यदि इस सिद्धान्त को मान लाया जाए तो राजस्थान से निरक्षरता हटने मेँ देर कितनी देर लगे । राजस्थान की जनता बहुत दिनोँ तक भेड़ोँ की तरह नहीँ हांकी जा सकेगी । इस लिए सब से पहले आवश्यकता है कि, राजस्थानी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया जावे ।"

* राहुल सांकृत्यायन
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"दीपै वांरा देश ज्यांरो साहित जगमगै ।"

*उदयराज उज्ज्वल
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‎"राजस्थानी को मान्यता और अपने घर मेँ [राजस्थान] अधिकृत रूप से उसकी प्रादेशिक भाषा के पद पर प्रतिष्ठा ,ये दो बड़े काम बाकी हैँ जिन्हेँ हम सब को मिल कर करना है । "

*मोहन लाल सुखाड़िया, पूर्व मुख्यमंत्री,राजस्थान
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‎"राजस्थानी भाषा का साहित्य खूब फलेफूले और राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता दी जानी चाहिए।"

* सेठ गोविन्द दास
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"राजस्थानी भाषा है या बोली ओ विवाद भलां ई चालू है पण इण मेँ कोई संदेह कोनीँ कै प्राकृत अर अपभ्रंश रै नजदीक जित्ती राजस्थानी है उत्ती शायद हिन्दी भी कोनीँ ।पंजाबी ,मराठी आद सब भाषावां रो मूळ स्त्रोत प्राकृत अर अपभ्रंश मेँ मिलै है , वां नै ...आज संवैधानिक भाषा रो दर्जो मिल्योड़ो है । राजस्थानी रै बारै मेँ विवाद रो कारण समझ सूं बारै है । खैर ! कुछ भी हो आपां नै तो विवाद मांय सूं संवाद खोजणो है ।

*आचार्य महाप्रज्ञ
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"विश्व की भाषाओँ मेँ राजस्थानी भाषा का पच्चीसवां स्थान है ।"

*डा.वेल्फील्ड, अमेरिका
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"सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार कानून बनाया गया है जिसके पैरा 29 (2)(एफ) मेँ यह प्रावधान है कि छात्र छात्राओँ को प्राइमरी शिक्षा उनकी मातृभाषा मेँ दी जाए । राजस्थान मेँ मातृभाषा राजस्थानी है जिसे संविधान की आठवीँ अनुसूची मेँ सम्मिलित नहीँ क...र रखा है तो भारत सरकार द्वारा जो शिक्षा का अधिकार कानून बनाया गया है उसकी पालना कैसे होगी ?18 दिसम्बर 2006 को संसद मेँ श्री प्रकाश जायसवाल द्वारा आश्वासन दिया गया था कि भोजपुरी व राजस्थानी को आठवीँ अनुसूची मेँ लेने का महापात्र कमेटी की अभिशंषा अनुसार 14 वीँ लोकसभा मे ही बिल लेकर आएंगे और मान्यता दिलवाएंगे जबकि अब 15 वीँ लोक सभा का भी दूसरा साल जा रहा है ।"

*अर्जुन मेघवाळ,सांसद
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 ‎"राजस्थान ने अपने रक्त से जो साहित्य निर्माण किया है उसकी जोड़ का साहित्य और कहीँ नहीँ पाया जाता और उसका कारण है राजस्थानी कवियोँ ने कठिन सत्य के बीच मेँ रह कर युद्ध के नगाड़ोँ के मध्य कविताएं बनाई थीँ । प्रकृति का तांडव रूप उनके सामने था ।...... राजस्थानी भाषा के साहित्य मेँ जो एक भाव है,उद्वेग है, वह केवल राजस्थान के लिए नहीँ अपितु सारे भारतवर्ष के लिए गौरव की वस्तु है ।"

*रविन्द्रनाथ ठाकुर
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"राजस्थानी वीरों की भाषा है,राजस्थानी का साहित्य वीर सहित्य है । संसार के साहित्य में उसका निराला स्थान है ।वर्तमान काल में भारतीय नवयुवकों के लिए तो उसका अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए !"

* पं.मदनमोहन मालवीय
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"हिन्दी हमारे राष्ट्र्भाषा है पर जिस ज़ुबा्न को हमने< मां के पेट से जन्म लेते ही सीखा वह भी हमारी भाषा है और मातृभाषा है । मातृभाषा हमें राष्ट्रभाषा के निकट ले जाटी है , उस से दूर नहीं फ़ैंकती । राजस्थानी हमारी मातृअभाषा है , उसका उपयोग और प्रचार करना वैसा ही अधिकार समझते हैं जैसा दूसरे प्रांत अपनी भाषाओं को अपनाने और फ़ैलाने का ।"

* जयनारायण व्यास,पूर्व मुख्यमंत्री,राजस्थान
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"हमें यह बात साफ़-साफ़ समझ लेनी चाहिए कि हम बंगला,मराठी,गुजराती,तमिल, तेलगु,कन्नड़ ,मलयालम और राजस्थानी आदि अन्य प्रांतीय भाषाओं की तरक्की चाहते हैं । हर प्रांत में वहां की भाषा ही प्रथम है । हिन्दी या हिन्दुस्तानी राष्ट्रभाषा अवश्य है और होनी भी चाहिए लेकिन प्रांतीय भाषाओं के पीछे ही आ सकती है ।"

* पं. जवाहर लाल नेहरू,प्रथम प्रधानमंत्री,भारत
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"राजस्थानी एक अलग भाषा के रूप में विकसित होगी और यथासमय राष्ट्र के विधान में स्वतंत्र रूप से स्थान पाएगी ।

राजस्थानी भाषा के द्वारा ही लोगों में जागृति का काम करना होगा । राजथान में प्राथमिक और माध्यमिक  शिक्षा और खास करके गांवों की शिक्षा राजस्थानी के द्वारा करने से लोगों में एकता की भावना और नवजीवन का संकल्प दोनों जोर पकडेगे ।" 

* काका कालेकर
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" मेरे मन में भारतवासियों के प्रति बडा़ आदरभाव है । भारतीय भाषाओं से मुझे बडा़ लगाव है । मेरी मातृभाषा इतालवी से भी ज्यादा मुझे राजस्थानी भाषा एवमं हिन्दी भाषा से प्रेम है ।"

* एल.पी. टेस्सीटोरी
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" राजस्थानी भाषा राजस्थान की भाषा है । समूचे राजपुताने [राजस्थान]  में ,मध्यभारत के पश्चिमी भागों ,मध्यप्रदेश,सिंध, व पंजाब के आस-पास के टुकडो़ में यह ओली जाती है जो एक ओर पश्चिमी हिन्दी से तथा दूसरी ओर गुजराती से भिन्न है तथा एक पृथक और स्वतंत्र भाषा के गौरव का अधिकार रखती है । "

* ग्रियर्सन,भाषा विज्ञानी
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" भारतीय भाषावां मे  संस्कृत पछै सब सूं जूनी अर सिमरिध राजस्थानी भाषा कहीजै । फ़ैलाव री दीठ सूं सगळी भाषावां सूं बत्ते क्षेत्रफ़ळ में इण भाषा नै बोलीजै ।

* मूळदान देपावत ,साहित्यकार
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निज भाषा साहित्य बिन , पनपै कदै न प्रान्त ।
सभ्य स्वतंत्र समाज रो , सदा अमर सिधान्त ॥

* कन्हैयालाल सेठिया
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" राजस्थान री भाषात्मक एकता सारू राजस्थानी भाषा नै मानता देवणे जरूरी है ,जिण राज देश नै लडा़कू जोढा दिया , उण री अवमानना अन्याय है । भाषा शास्त्रियां री दीठ में राजस्थानी भाषा एक भाषा है , जनता री भावनावां अर परिस्थितियां न कबूळणी राजनीतिग्यता है । भाषा विधेयक सूं राष्ट्रीयता रो कोई नुकसाण नी हुवै । "

* पूर्वमहाराजा करणी सिंह, सांसद,बीकानेर [१७ फ़रवरी १९६८ नै संसद में भाषा विधेयक राखतां  ]
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" राजस्थानी भाषा जो न केवल भारत में है बल्कि विदेशों में भी इसके साहित्य पर रिसर्च हो रहा है और यह एक ऐसी भाषा है जिसमें एक-एक शब्द के दो सौ पर्यायवाची शब्द हैं । हिन्दी हमारी भाषा है.......हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है उनके प्रति सम्मान है लेकिन राजस्थानी भाषा जो प्रदेश के अनेक हिस्सों में बोली जाती है........इसको संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया जाए ।"

* डा. बी.डी. कल्ला भू,पू.मंत्री एवम विधायक,बीकानेर {२५-९-१९९२ नै विधान सभा में }
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"...मुझे खुद को ऐसा महसूस होता है कि यदि कोई मैसेज कनवे करना है,कोई बात कहनी है लोगों के गले उतारनी है तो राजस्थानी भाषा का प्रयोग किया जाए,उससे ज्यादा कोई दूसरा बढि़या साधन नहीं हो सकता ।...न दिलों का बंटवारा होगा,न राजस्थान का बंटवारा होगा ,न देश का बंटवारा होगा, कोई बंटवारा नहीं होने वाला है और इस लिए इस भाषा के बाद बंटवारे की बात नहीं जोडे़ तो ज्यादा अच्छा रएगा ।"

* भैरोंसिंह शेखावत,भू.पू.मुख्यमंत्री,राजस्थान [२५-९-१९९२ नै विधानसभा में ]
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"नि्संदेह १०-१२ करोड़ राजस्थानी बोलने वालों की भाषा को केवल बोल-चाल की भाषा बता कर उसे मान्यता प्रदान नहीं करना एक संवैधानिक भूल है !"

* हरीशंकर सिंघानिया
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" राजस्थानी भाषा नै संविधान री आठवीं पानडी़ {अनुसूची} में जोडा़वण सारू म्है सब प्रयास कर रिया हां । इण सारू राजस्थान सरकार अर भारत सरकार रा मुखियावां नै बार-बार कागद  लिख रह्यो हूं । आसा है, आपणो सबां रो ओ प्रयास अकारथ नहीं जावैला । "

*  महाराजा गजसिंह, पूर्व महाराजा अर सांसद ,जोधपु 
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" राजस्थानी भाषा विश्व की १३ समृद्ध भाषाओं में से एक समर्थ भाषा है ।"

* अमेरीकन कांग्रेस ओफ़ लाईब्रेरीज
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" भारत नै आज़ाद हुयां ५७ बरस होगा, पण राजस्थानी भाषा नै जिकी १५ करोड़ {७ करोड़ प्रवासी }लोगां री भाषा है , भारत रै संविधान में मान्यता नहीं देणों - सम्विधान री घोर अवमानना है । प्रजातांत्रिक संविधान में संविधान री जड़ पर कुठारा घात करियो गयो है ।- आ घणीं चिन्ता री बात है । राजस्थान विधान सभा में राजस्थानी भाषा नै सर्वसम्मत संकल्प {प्रस्ताव }्सैं पारित कर’र केन्द्रीय सरकार नै भेज्यो , पण बीं पर तानाशाही राजनेता विचार तक कोनी करियो , आ राजस्थानियां रै लिए अपमानजनक बात है । अब समै आग्यौ है कै सब राजस्थानी एकजुट होय जन-जागरण रै वास्तै अब हियान सरू करै ।’

* कन्हैया लाल सेठिया
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राजस्थानी भाषा प्रचार सभा खानी सूं जयपुर में १८ सूं २० मार्च १९६६ तक विद्वाना री ऐक गोठ तेडी़ ! ईन गोठ में राजस्थानी भाषा पैटै कई प्रस्ताव पारित होया !  इण में सूं ऐक प्रस्ताव :-
                                            प्रस्ताव-१
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"राजस्थानी भाषा अर सहित्य रै ईन उपन्षद रै मौकै पर भेळा हुयोडा़ राजस्थान रा साहित्यकारां अर विद्वानां रो यो पक्को मत है कै राजस्थान री स्वभाविक मातृभाषा राजस्थानी है । भारतीय भाषावां रै ऐतिहासिक काळक्रम अर भारतीय भाषा विज्ञान रै सिद्ध निष्कर्षां रै आधार पर राजस्थान प्रदेश मातृभाषा री दृष्टि सूं हिन्दी प्रदेश कोनीं । राजस्थानी भाषा अर साहित्य में जण-जीवण रै व्यवहार री धारावाही परम्परा अपभ्रंश काळ सूं ई अविच्छन्न रूप सूं चालती आई है । इण वास्तै उपनिषद रै मौकै पर भेळा हुयोडा़ राजस्थान रा साहित्यकारां अर विद्वानां रो यो फ़ैसलो है कै राजस्थान री दो ढाई क्रोड़ लोगां री स्वाभाविक मातृभाषा नै प्रदेश अर राष्ट्र रै स्तर पर पक्कायत मानता मिलनी चाईजै !  इण वास्तै यो निर्णय करियो जावै कै राजस्थानी री बोलियां रो उदारता सूं विकास करतां हुयां राजस्थानी भाषा रै रूप रो विकश करियो जावै अर राजस्थानी भाषा री मानता री समस्या नै सारै राजस्थान में चेतना पैदा करता हुयां सुळझाई जावै । "
 
प्रस्तावक= जनार्दनराय नागर
समर्थक=सुमनेश जोशी
 
उपस्थित=रेवतदान चारण,हरीन्दर चौधरी , प्रो.मदनगोपाल शर्मा, डा.मनोहर शर्मा, सीताराम लालस, कोमल कोठारी, लाल कवि,श्रीलाल नथमल जोशी, परमेश्वर सौलंकी, सौभाग्यसिंघ शेखावत, प्रो.प्रेमचन्द विजयवर्गीय, श्रीलाल मिश्र, उमराव सिंह मंगळ, देवीलाल पालीवाल, सत्यनारायण प्रभाकर"अमन", हणूंतसिंह देवडा़, प्रल्हादराय व्यास, प्रो.शंभुसिंह मनोहर, डा.हीरालाल महेश्वरी, बुद्धिप्रकाश पारीक, रामवल्लभ सोमाणी, नरोतमदास स्वामी, मंगळ सक्सैना, सुमनेश जोशी,  कुं.चन्द्रसिंह बिरकाळी, मूळजी व्यास, मूळचन्द जौहरी, महाराणी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, मुरलीधर व्यास, शंकर पारीक, सवाई सिंह धमोरा, रेवाशंकर, डा. नरेश भानावत, मूळचन्द सेठिया, रामनिवास शाह, हिम्मतलाल हिमकर नेगी, सीता राम पारीक, मनोहर प्रभाकर, कल्याणसिंह राजावत, रामकृष्ण बोहरा, रावत सारस्वत, जनार्दन राय नागर, प्रो.विद्याधर शास्त्री, गिरीश जी पांडेय, वेद व्यास, नेमीचन्द श्रीमाल, डा.सरनामसिंह शर्मा, औंकार सिंह [I.A.S.], कन्हैयालाल अर कामतागुप्त कमलेश
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" राजस्थानी नै संविधान में मानता कोनी मिली ! इण काम में श्री कन्हैयालाल माणकलाल मुंशी अगवा हा बै राजस्थान अर गुजरात नै भेळ’र राजस्थान पर गुजराती थौपणै रा सुपना देखता हा, जिकै सूं राजस्थानी री पुकार सुणी कोनी गई । राजस्थानी भाषा री आज री हालत री तुलना सो बरस पैली री हिन्दी सूं करां तो राजस्थानी भाषा हिन्दी सूं कित्ती ई जादा समर्थ अर प्राणवान ही । हिन्दी म्हारी राष्ट्रभाषा है पण इण रो ओ मतलब कोनी कै राजस्थानी म्हारी मातृभाषा कोनीं । हिन्दी नै जे दूजी प्रांतीय भाषावां सूं कोई खतरो कोनी तो फ़ेर राजस्थानी भाषा सूं खतरो किंयां होय सकै ! "
 
*श्री नरोत्तमदास स्वामी,भाषाविद, [राजस्थानी भाषा प्रचार सभा, जयपुर री गोठ में ,१८ सूं २० मार्च १९६६]
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"म्हे लोग राजस्थानी भाषा नै राजस्थान री मातृभाषा मानां अर हिन्दी नै राष्ट्रभाषा । जका लोग आ बात कैवै कै राजस्थानी भाषा री बढो़तरी सूं हिन्दी री हाण हुवै, बै बेईमान है ।"
 
* जनार्दनराय नागर , भाषाविद  [राजस्थानी भाषा प्रचार सभा, जयपुर री गोठ में ,१८ सूं २० मार्च १९६६]
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" The Rajasthaani language , our source of communication and rich in values, has not been given its proper recognition as one of the regional  lenguage in the Constitution.......We, the NRIs of rajasthani origin , resole and strongly feel that as this language is the main uniting force in a foregn land. immediate steps should be taken for the recognition of this language in the rajasthan assembly and to insert it in the Constitution of India. "
 
* K.K. Mehata, CPA, RANA[Rajasthani association of  north america-5-7-2003]
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"नेतावां रै प्रताप सूं  राजस्थान री मातभाषा हिन्दी घोषित होयोडी़ है । राजस्थान बरसां सूं हिन्दी री सेवा करतो आ रेयो है अर आगै भी करतो रैसी , पण राजस्थान री मातभाषा री वेळा हिन्दी रो नांव लेवणों करोडू़ राजस्थान्यां री भावनावां  सागै खिलवाड़ करणो है । जद चुणावां रो मौको आवै तो नेताजी खुद आपरा भाषण राजस्थानी भाषा में देवै , बै जे सांचै मन सूं हिन्दी नै अठै री मातभाषा मानता होवै तो बांरा  भासण भी हिन्दी में होंवता  , राजस्थानी में नीं । राजस्थानी मातभाषा है, बा मा रै दूध सागै ई टाबर में प्रवेश करै, पण  टाबर  जद बडो होवै तो उण नै गाय रो दूध भी सेवन करणो पडै़। ऐक तो होवै आपणी जलम री देवाळ मा  अर दूजी होवै गाय-माता । आ ई स्थिति भाषावां री है। मा रै दूध रो दरजो तो मात भाषा रो ई रैसी । हां,गाय रो दूध भी आगै चाल’र अपरिहार्य है, उण हालत में आखो राजस्थान-सगळो राजस्थान ऐक सुर में ,समवेत सुरां में हिन्दी  अर फ़कत हिन्दी नै  ई देश री सम्पर्क भाषा रै रूप में स्वीकारै पण मातभाषा रो पद तो खाली राजस्थानी भाषा खातर सुरक्षित है, उण माथै दूजो पग टेक सकै कोनीं ।"


* श्रीलाल नथमल जोशी,साहित्यकार,बीकानेर  [आस्था रा आखर-कोलकाता]
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"[ १] राजस्थानी भाषा अर साहित्य भाषा-
  
        -सन ११०० रै नैडै़-तेडै राजस्थानी रो उदभव


[क] सन १४५० तांई गुजराती अर राजस्थानी ऐक इज ही ।
  
        -ईं काळ तांई दोनां रो साहित्य ऐक है


[ख] हिन्दी रै " आदि काल" री काव्य भाषा है

      -राजस्थानी अर राजस्थानी सूं प्रभावित हिन्दी
      -राजस्थानी साहित्य हिन्दी रै आदिकाल रो साहित्य
      -राजस्थानी रो प्रभाव अर व्यापकता-
        कबीर,जायसी आदि री भाषा
        दखणी हिन्दी, पहाडी़ हिन्दी अर नेपाली भाषावां

[२]  राजस्थानी साहित्य री निजि अथवा जातीय विशेषतावां-
       
      [१] चारण साहित्य-
         
         -ऐतिहासिक अर वीर रसात्मक
         -सेस भारतीय आर्य भाषावां में न्यारो ई महत्व
          - गीत,दूहा,छप्पय,नीसाणी,प्रबन्ध काव्य
          - मध्यकाल रै राजनैतिक, सांस्कृतिक इतिहास रो अटूट भंडार          
          -राष्ट्र-संकट अर ओ साहित्य
     
[३] पौराणिक अर  धार्मिक-
          
         भगवान रा दो रूप घणां उजागर हुया-
          -वीर अर भक्त उद्धार्क
         -परस्थिति’र स्वभाविकता-रामरासौ
   [३] जैन साहित्य-
         -कथा काव्य
         -लोकगीतां री ढाल
         - परम्परा
          - भाषा रै इतिहास री सामग्री
           -सैंकडूं अजैन ग्रंथां रो रख-रखाव अर लेखण
   [४] सन्त काव्य
           -देस री भावनात्मक ऐकता अर आत्मौथान रो अनोखो प्रयास
           -निर्गुण,सगुण,अर सगुणोन्मुख निर्गुण
           -नाथ पंथ-राजस्थान अर हरियाणो इण रो गढ
           -गुणवत्ता अर परिमाण में बेजोड़
            -बोली सुधार
           [क] बै जका एक जीवण पद्धति रै रूप में सम्प्रदाय री थरपणा करी अर बांरा मानण आळा-
               [१]  अग्रदास{रैवास,सीकर}- रामभक्ति में मधुर उपासना
               [२]  जाम्भो जी                 -विष्णोई सम्प्रदाय
              [३]  जसनाथ जी                 -जसनाथी सम्प्रदाय
              [४] परशुरामदेव जी           -निम्बार्क सम्प्रदाय
              [५]  हरिदास जे                    -निरंजनी सम्प्रदाय

              [६]  दादूदयाल जी                 -दादू पंथ
              [७]  लालदास जी                 -लाल पंथ अथवा लालदासी सम्प्रदाय
              [८]  चरण दास जी                 -शुक अथवा चरणदासी सम्प्रदाय
                [९] रामचरण जी                  -रामस्नेही सम्प्रदाय[शाहपुरा]
               [१०] दरियावजी                        -रामस्नेही सम्प्रदाय [रैण]]
               [११] हरिरामदास जी              -   रामस्नेही सम्प्रदाय [सींथळ]             
               [१२]  रामदास्जी                        -रामस्नेही सम्प्रदाय [खेडा़पा]
                [१३] जी जी देवी                     -आई पंथ [बिलाडा़]
                 [१४] लालगिरि                           -अलखिया सम्प्रदाय
             [ख] बै संत जका सम्प्रदाय परम्परा सूं अळगा हा- पीपा जी,काजी महमूद,मीरां बाई दीनदरवेश आद
[५] आख्यान काव्य-
         विसेसतावां-
          मध्यकाल में सगळा सूं घणी हिन्दू समाज री सांस्कृतिक सेवा आख्यान काव्यां करी आं रो चलण-           राजस्थानी री इज देण है-

                [१] डेल्हजी          -कथा अहमनी
                [२] पदम भगत    -रुक्मणी मंगळ
               [३] मेहोजी            -रामायण
               [४] केसोजी           -प्रहलाद चरित आद
[६] लोक काव्य -
        प्रेम गाथावां - स्त्री-पुरुष री प्रेम भावनावां रो अमर संगीत- भावनावां रो दरियाव-
          [१] ढोला-मारू
           [२] जेठवा-ऊजळी
            [३] शेणी-वीजानंद
             [४] नागजी-नागम्ती
         करूणा रो बोलतो चितराम-
               [१] नरसी मेहता रो मायरो
          वीरता,प्रेम रो अमर भाव-
                [१] निहालदे-सुल्तान
                [२] बगडा़वत
           वीरता अर वचन-पालण रो अनोखो सुर-
                 [१] पाबूजी रा पवाडा़
                  [२] तेजोजी
            लोक-गीत-धरती री धुन-
                   [१] इतिहास री दीठ , बातां अर लोककथावां
                   
[७] गद्य-
        भारतीय भाषावां में नुईं औळखाण- तेरवीं सई सूं आज तांईं री परम्परा-बात,ख्यात,बिगत,कथा आद
[८] १९ वीं सई - पळटाव अर बदळाव-
           -राष्ट्रीयता रो सुर
            -चेतावणी अर संदेश

             - नुवां विचारां रा वैतालिक

               १-बांकीदास
                २- सूर्यमल मीसण
                 ३-संकरदान सामोर-एक दीठ-हिन्दी अर राजस्थानी रा भूल्या बिसरया पात्र
               अर कीं पछै- बारहट केसरीसींह रा चेतावणी रा चूंगट्या
[९] आज़ादी-अर ईं रै पछै-साहित्य-
[१०] भाषा री समृद्धि-
                   -ईं री सबद सम्पदा
                   -सबद अर अर्थ छाया
[११] संक्षेप-
         १- भाषा री देण
          २- साहित्य री देण
           - कर्मठता अर कर्मशीलता
            -वीरता, त्याग,बलिदान अर देस सेवा
            -भेदभाव पर चोट
            -धरती अर जीवण सूं जुडे़डो़
             -उद्दात भावना रो स्रोत
             -जागरण अर चेतावणी रो हेलो
              -गुणां रो पैरैदार
             ३-इतिहास नै देण
              ४-संस्कृति नै देण
              ५-देस-निर्माण री नींव

  

डा. हीरालाल महेश्वरी, पूर्व अध्यक्ष हिन्दी विभाग,राजस्थान विश्वविद्यालय,जयपुर [आस्था रा आखर-कोलकाता]

नोरता : नो देव्यां रा रूप

नोरता : नो देव्यां रा रूप

          -ओम पुरोहित कागद



पैलो नोरतो -सैलपुत्री पैलां सिरै



नोरता नौ देवियां रा रूप। देवी सगती री नौ रातां अर नौ दिन। देवी अर रातां एकूकार। इणी नौ दिनां में महालक्ष्मी परगटाई नौ देवियां। इणी नौ देवियां नै नवदुरगा बखाणीजै। नोरतां रै नौ दिनां अर नौ रातां में इणीज नव दुरगा री ध्यावना होवै। श्री लक्ष्मणदान कविया(खैण-नागौर) रचित दुरगा सतसई में नव दुरगा री विगत-

सैलपुत्री पैला सिरै, ब्रह्माचारिणी दुवाय।
तीजी चंद्रघंटा'र चव, कुषमांडा कहवाय।।
स्कंध माता पांचवीं, कात्यायनी छटीज।
कालरात्रि सातमी, महागौरी अस्टमीज।।
नवौ नांव दुरगा तणौ, सिद्धदात्री संसार।
प्रतिपादित बिरमा किया, सहजग जाणणहार।।

नवदुरगा में पैली दुरगा सैलपुत्री। मां भागोती रो पैलो सरूप। परबतराज हिमवान री लाडेसर बेटी। सैल नाम परबत रो। इणी कारण नांव थरपीज्यौ सैलपुत्री। सैलजा भी इण रो नांव। सैलपुत्री री सुवारी बळद। इण रै डावै हाथ में तिरसूळ। जीवणै हाथ में मनमोहणो कमल पुहुप। सिर माथै सोनै रो मुगट अर आधो चंद्रमां। पैलड़ै जलम में राजा दक्ष री कन्या रूप में जलमी। उण जलम में नांव पण सती। उण जलम आप घोर तप करियो। भगवान शिव नै राजी कर वर रूप में हांसल करियौ। पण दक्ष नै बेटी री आ बात नीं जंची। उणां शिव नै सती रै वर रूप में अणदेखी करी। सती नै आ बात अणखावणी ढूकी। सती रा बापू सा एकर जिग करियौ। सती रा वर शिव री अणदेखी करी। सती नै आ बात दाय नीं आई। बै रिसाणी होय'र बापू सा रै जिग-कुंड में बळ परी भस्म होयगी। उणां भळै हिमालय री कन्या रूप में दूजो जलम लियो। भळै तप करियो अर पाछी भगवान शंकर री अधडील बणी। उणां नै मनमुजम शंकर भगवान वर रूप में मिल्या।
सैलपुत्री नै मिली मनवाछिंत सिद्धि। इणरै पाण बै मनसां पूर्ण हुई। मनसां पूरण सारू लोग उणां नै हाल ताणी धौके-ध्यावै। घोर तपियां अनै जपियां नै दुरगा रो सैलपुत्री रूप घणौ भावै। जोगी सैलपुत्री नै ध्यावै। आं नै पड़तख राख जोग करै। जोग करतां मन नै मूळ आधार में थिर करै। इणरी ध्यावना सूं जोग्यां रा जोग जमै। तपियां रा तप सधै। जपियां रा जप फळै। जोग रा संजोग बैठै। जोग साधना री मूळ थरपीजै। नोरता पूजन रै पैलै दिन सैलपुत्री री उपासना सूं मन मुजब इंच्छा पूरण होवै। जग जामण मां दुरगा री पूजा में हर दिन मां रा सिणगार करीजै। हर दिन पण निरवाळा सिणगार। पैलै नोरतै में माता रा केश संस्कार करीजै। इण दिन माता जी री देवळ नै द्रव्य-आवंळा, सुगधिंत तेल भेंटीजै। केश संवारिजै। केश सवांरण री जिन्सां भेंटीजै। आखै दिन एकत राखीजै अर दुरगा सप्तसती रा पाठ करीजै।

 दूजो नोरतो
धीरज धिराणी ब्रह्माचारिणी


नवदुरगा रा नव रूप निराळा। हर रूप मनमोवणो -मनभावणो। रूपां री पण छिब निरवाळी। ऐड़ी ही निरवाळी छिब मात ब्रह्माचारिणी री। जग जामण महालक्ष्मी ब्रह्माचारिणी नै दूजी देवी रूप परगटाई। बह्मा सबद रो मतलब तप। ब्र्रह्माचारिणी घोर तप अर धीरज री धिराणी। आं में तप री सगति अपरम्पार। आं रै तप नै नीं कोई लख सकै, नीं लग सकै। चारिणी सबद रो मतलब चालण आळी। यानी तप रै गैंलां चालण आळी। घोर तप रै गैलां चालण रै कारण नांव थरपीज्यो ब्रह्माचारिणी। इण नावं सूं जग चावी। बडा-बडा रिखी-मुनि, जोगी, सिद्ध, ग्यानी-ध्यानी, तपिया-जपिया अर हठिया भी आं रो तप देख'र चकरी चढ्या। आंख्यां तिरवाळा खायगी।
ब्रह्माचारिणी रो रूप भव्य। लिलाड़ माथै तप रो ओज। आं रो सरूप जोता-जोत। जोतिर्मय। डावै हाथ में कमडंळ। जीवणै हाथ में जप माळा। सिर माथै सोनै रै मुगट री सोभा निरवाळी। नोरतां रै दूजै दिन इणी मां दुरगा री पूजा हौवै। उपासना करीजै। मां दुरगा रो सुरंगो रूप भगता नै भावै। आं री ध्यावना सूं भगतां, सिद्धां, जोग्यां, ध्यान्यां, तपियां अर जपियां रा मनोरथ पूरीजै। भगतां- सिद्धां नै अखूट-अकूंत फळै ब्रह्माचारिणी रा दरसण। धीरज-धिराणी ब्रह्माचारिणी री ध्यावना मिनखां में धीरज बपरावै। मिनखां में त्याग,वैराग्य अर धीरज रो बधैपो करै। इण री किरपा चौगड़दै। चौगड़दै सिद्धि। चारूकूंट विजय दिरावण वाळी। धीरज धिराणी बह्माचारिणी मिनखां में सदाचार अर संयम बगसावै। जोग्यां नै जोग सारू तेडै जोग-साधक दूजै दिन आपरै मन नै स्वाधिष्ठान चक्र में थिर करै। इण चकर में थिर मन माथै ब्रह्माचारिणी री किरपा बरसै। ऐडो साधक देवी री किरपा अर भगति नै पूगै।
नोरतां रै दूजै दिन मां दुरगा री खास पूजा होवै। इण दिन माता रा केस गूंथीजै। बाळ बांधीजै। चोटी में रेसमी सूत का फीतो बांधीजै। माता रै बाळां री सावळ संभाळ करीजै। लगो-लग श्री दुरगा सप्त्सती अर मारकण्डेय पुराण पाठ करीजै। एकत पण चालतौ रैवै। आज रो बरत नोरतै रो दूजौ बरत बजै।

तीजो नोरतो
मस्तक घंटा धारिणी चंद्रघण्टा


तीजै नोरतै री मैमा न्यारी। ध्यावै जगती सारी। तीजो नोरतौ जगजामण मात रै तीजै सरूप चंद्रघण्टा रै नांव। मात चंद्रघण्टा रै मस्तक माथै घण्टैमान चंद्रमा बिराजै। चंद्रमा मस्तक माथै सौभा पावै। इणी कारण माताजी रो तीजो सरूप चंद्रघण्टा। मात चंद्रघण्टा दस हाथ धारै। जीवणै पसवाड़ै रा पांच हाथ अभय दिरावण री छिब में। सरीर सोनै वरणो। एक हाथ में कमल। दूजै में धनुख। तीजै में बाण। चौथै में माळा। पांचवौ हाथ आसीस में उठियो थको। माताजी रै डावै हाथां में भी अस्तर। एक हाथ में कमण्डळ। दूजै में खड़ग। तीजै में गदा। चौथै में तिरसूळ। अर एक हाथ वायुमुद्रा में। चंद्रघण्टा रै शेर री सवारी। कंठा पुहुपहार। कानां सोनै रा गैणा। सिर सोनै रो मुगट। चंद्रघण्टा दुष्टां रो खैनास करण नै उंतावळी। दुष्टदमण सारू हरमेस त्यार। मानता कै चंद्रघण्टा नै ध्यावणियां शेर री भांत लूंठा पराकरमी अर भव में डर-मुगत भंवै। मात चंद्रघण्टा आपरै भगतां नै भुगती अर मुगती दोन्यूं एकै साथै देवै। मन-वचन-करम अर निरमळ हो विधि-विधान सूं चंद्रघण्टा रै सरणै आय जकौ ध्यावै उण नै मन-माफक वरदान मिलै। ऐड़ा भगत सांसारिक कष्टां सूं मुगत होय परमपद ढूकै। तीजै नोरतै री खास बात। इण नोरतै में माताजी नै खुद रो फुटरापो गोखाईजै। इण दिन उणां नै आरसी में मुंडो दिखाईजै। इणीज दिन माता जी नै सिंदूर भेंटीजै।

गणगौर पूजा

नोरतै रै तीजै दिन यानी चैत रै चानण पख री तीज नै गौरी-शंकर री पूजा होवै। गौरी मात जगदम्बा यानी पार्वती। पार्वती रा धणी शंकर। इण दिन आं दोन्यां री पूजा ईसर-गणगौर रै रूप में होवै।

चौथो नोरतो
मधरी-मधरी मुळकै कूष्माण्डा

 चौथै नोरतै री धिराणी कूष्माण्डा माता। कूष्माण्डा कैवै कूम्हड़ै अर पेठै नै। ब्रह्मांड पैठै-कुम्हड़ैमान। इणी कूष्माण्डामान ब्रह्मांड री सिरजणहार माता कूष्माण्डा। दुरागाजी रै इणी चौथै सरूप रो नांव कूष्माण्डा माता। कूष्माण्डा री मधरी-मधरी मुळक। इणी मधरी मुळक सूं अण्ड अर ब्रह्मांड नै सिरज्या। अण्ड अर ब्रह्मांड री सिरजणां रै पैटै दुरगा रै इण सरूप नै कैवै कूष्माण्डा माता। ब्रह्मांड री सिरजणहार होवण रै पाण ई आप सिरस्टी री आद-सगत। आप रै सरीर रो तप-औज सुरजी मान पळपळावै। कूष्माण्डा माता रै आठ हाथ। इणी पाण आप अष्टभुजा देवी भी बखाणीजै। आप रै जीवणै पसवाड़ै रै च्यार हाथां में कमण्डळ, धनुख, बाण अर कमल बिराजै। डावै हाथां में इमरत कळस, जपमाळा, गदा अर च कर साम्भै। सीस सोनै रो मुगट। कानां सोनै रा गैणां। शेर री सवारी। कूष्माण्डा माता री ध्यावना सूं भगतां रा सगळा संताप मिटै। रोग-सोग समूळ हटै। उमर, जस, बळ अर निरोगता बधै।
चौथै नोरतै में साधक रो मन अनाहज चक्र में बास करै। इण सारू माणस नै निरमळ मन सूं कूष्माण्डा माता री ध्यावना करणी चाइजै। माताजी रा जप-तप अर ध्यावना भगत नै भवसागर पार उतारै। माणस री व्याध्यां रो मूळनास होवै। दुख भाजै। सुख रा डेरा जमै। इण लोक अर आगोतर री जूण सुधारण सारू कूष्माण्डा माता री ध्यावना करीजै।

 पांचवों नोरतो
कार्तिकेय जननी स्कन्द माता

पांचवैं नोरतै री धिराणी स्कंद माता। स्कन्द माता दुरगाजी रो पांचवों सरूप। स्कन्द रो एक नांव कार्तिकेय भी। कार्तिकेय पण माताजी रो लाडेसर बेटो। कार्तिकेय री जामण होवण रै कारण ई इण सरूप रो नांव स्कन्द माता। देवतावां रै बैरी तारकासुर नै स्कन्द माता जमलोक पुगायो। माताजी रै च्यार हाथ। जीवणै पसवाड़ै रै एक हाथ सूं आपरै लाडेसर नै गोद्यां बैठाय'र झालियोड़ो दूजै हाथ में कमल पुहुप। डावै पसवाड़ै रै एक हाथ में आसीस छिब। दूजै हाथ में भळै कमल पुहुप। सिर माथै सोनै रो मुगट बिराजै। कानां में सोनै रा गैणा। सिंघ री सवारी। स्कन्द माता संसार्यां नै मोख दिरावै। ध्यावणियां भगतां री मनस्यावां पूरै। पांचवै नोरतै में ध्यावणिया जोग्यां रो मन विशुद्ध चक्र में थिर रैवै। इण कारण ध्यावणियां रै मनबारै री अनै भीतरली चित्त वरत्यां रो लोप हो जावै। पांचवै नोरतै नै साधक माताजी रै अंगराग अर चनण रा लेप करै। भांत-भांत रा गैणा-गांठा पैरावै।

लिछमी पांच्यूं

आज लिछमी पांच्यूं भी। लिछमी भी माताजी रो एक सरूप। लिछमीजी कमल आसन माथै विराजै। कमल मतलब पदम। इण सारू आप रो एक नांव पदमासना भी। बिणज-बौवार करणियां नैं माताजी रो ओ रूप डाडो भावै। ऐ लोग माताजी रै लिछमी रूप नै ध्यावै। बिणज अर धन रै बधेपै री कामना करै। माताजी बां रा मनोरथ पूरै।

खाता उल्टा पल्टी रो दिन


बिणज-बोपार में आज रो दिन रोकड़ खाता पल्टी रो। वित्तीय लेखा बरस रो पैलो दिन। इण दिन बोपारी हिसाब फळावै। लेण-देण चुकावै। तळपट मिलावै। आपरै बिणज री बईयां बदळै। रोकड़, खाता अर चौपड़ी पलटै। लेण-देण री खतोन्यां खतावै। नूवीं बईयां री पूजा करै। नूवीं रोकड़, खाता अर चौपड़ी रै पैलै पानै माथै 'गणेशाय नम:' लिखै। रोळी सूं साथियौ (साखियौ) मांडै। उण माथै पान-सुपारी, रोळी-मोळी अर फळ-प्रसाद चढावै। दूजै पानै माथै लिखै- 'लिछमीजी महाराज सदा सहाय छै। लाभ मोकळा देसी।' इणी माथै लिछमी सरूप 'श्री' इण भांत लिखै-


                                                   श्री  
                                               श्री श्री
                                             श्री श्री श्री
 ॥ शुभ  ॥                          श्री श्री श्री श्री                             ॥  लाभ॥
                                       श्री श्री श्री श्री श्री
                                     श्री श्री श्री श्री श्री श्री
                                  श्री श्री श्री श्री श्री श्री श्री


इण रै असवाड़ै-पसवाड़ै 'शुभ-लाभ' अर 'रिद्धि-सिद्धि' लिखै। रोळी कूं-कूं चिरचै। चावळ भेंटै। नूंई लेखणी-कलम-कोरणी बपरावै। इण माथै भी मोळी बांधै। अब पण लोगड़ा कम्प्यूटर-लेपटाप बपरावै तो इण जूंनी परापर नै कठै ठोड़!

छठो नोरतो
लाडकंवरी कात्यायनी


दुरगा रै कात्यायनी सरूप रै निमत। माता कात्यायनी महारिखी कात्यायन रै घरां लाडकंवरी रूप जाई। इणी कारण नांव थरपीज्यो कात्यायनी। महारिखी कात्यायन दुरगाजी री ध्यावना करी। जप-तप कर्यो। इणी रै पेटै कात्यायनी आसोज रै अंधार पख री चवदस नै उणां रै घरां जलम लियो। जलम रै बाद आसोज रै चानण पख री सात्यूं , आठ्यूं अर नौम्यूं नै महारिखी री पूजा सीकारी। दसमी नै भैंसासुर नै सुरगां रै गैलां घाल्यो। इण रो बखाण लक्ष्मणदान कविया आपरी दुरगा सतसई में इण भांत करियो-

उछळी देवी कैय आ, चढी दैत रै माथ।
दबा परौ पग भार सूं, सूर वार कंठाथ।।
पगां भार दाबियौ थकौ, मुखां निकळ नव भाव।
ठमग्यौ आधौ निकळ नै, देवी तणै प्रभाव।।
अरध निकळियौ जुध करै, देवी सूं म्हादैत।
बडखग सूं सिर काटियौ, देव भलाई हेत।।
सेन मझां मचियौ जबर, असुरां हाहाकार।
सेना सगळी भाजगी, देवां हरख अपार।।


माता कात्यायनी रो सरूप सोवणौ अनै मनमोवणौ। आं रै च्यार हाथ। जीवणै पसवाड़ै रै एक हाथ में खड़ग। दूजै में पोयण(कमल) रो पुहुप। सिंघ आपरी सुवारी। सिर माथै पळपळाट करतो सौनै रो मुगट सौभा बधावै। कात्यायनी माता व्रजमंडळ री अधिष्ठात्री बी बजै। आं री पूजा छठै दिन करीजै। इण दिन माताजी नै पुहुप अर पुहुप-माळा भेंटीजै। ध्यावणियां नै माताजी इंछा फळ देवै। भगतां रा दुख-दाळद मेटै। साधक नै अर्थ, धर्म, काम, मोख सगळा भेळै ई सौरफ सूं मिलै। आज रै दिन ध्यावना करणियै रो मन आज्ञा चक्र में थिर रैवै। जोग साधना में आज्ञा चक्र री ठावी ठोड़ अणूती मैमा। इण चक्र में थिर मन रो भगत माता जी रै चरणां में सो कीं निछरावळ कर देवै। भगत नै पड़तख माताजी रा दरसण होवै। आं नै ध्यावणिया इण लोक में रैवतां थकां आलोकिक तेज राखै।

जमनाजी रो जलम दिन


आज जमनाजी रो जलम दिन भी है। यमुना जंयती। सूरज भगवान रै घरां आज रै ई दिन जमनाजी जलम्या। आज नोरतै रै साथै-साथै जमनाजी री भी पूजा होवै। लुगायां जमनाजी री कथा सुणै। सूरज महातपी। प्रजापति विश्वकरमा सुरजी नै आपरी बेटी संज्ञा रै वर लायक मान्यो। संज्ञा रो ब्यांव सुरजी साथै कर दियो। संज्ञा रै तीन औळाद होई। दो छोरा अर एक छोरी। छोरां रा नांव मनु अर यम। छोरी रो नांव यमुना। आपणी भाषा में कैवां जमना। जमनाजी भी तपी-जपी। भगतां रा दुख-दाळद मेटै। पाप मुगत करै। जको जमनांजी में न्हावै। ध्यावै। उण नै जमनाजी रा भाई जमराज नीं संतावै।

सातवों नोरतो
सदा सुब करै काळी माता

माता दुरगाजी रो काळरात सरूप। माताजी रै इण रूप नै काळी माता अर काळी माई बखाणीजै। कालरात्रि पण आपरो नांव। इण माताजी रो डील अंधारैमान काळो। सिर रा बाळ खिंडायोडा। गळै में बीजळी दाईं चमकती माळा। काळी माता रै तीन आंख्यां। नासां री सुंसाड सागै अगन री लपटां निसरै। आं री सुवारी गधे़डो। काळी माता रै च्यार हाथ। जीवणै पासै रो ऐक हाथ डरमुगत करण री अर दूजो हाथ वरदान देवण री छिब में। डावै पासै रै ऐक हाथ में लो' रो कांटो अर दूजै हाथ में तरवार। काळी माता रो सरूप देखण में जबर डरावणो। विकराळ। ऐ माता जी पण हरमेस भला फळ देवण आळी। हरमेस सुब-सुब ई करै। इण कारण इणां नै शुभंकरी भी कैईजै।
काळी माता नै घोर जपिया जपै। तपिया तपै। जादूगर इण माताजी रा लूंठा भगत। इंदरजाळ अर काळो जादू सीखण आळा काळी माता नै ध्यावै। लोगड़ा आपरै टाबरां नै उपरळी बीमारयां सूं बचावण रै मिस धोकै। भूत-प्रेत, टूणा-टसमण अर लाग-बांध नै टाळण सारू काळी माता नै ध्यावै। काळी माता री पूजा सात्यूं नै करीजै। इण दिन माताजी री पूजा घर रै बिचाळै करीजै। जोग्यां अर साधकां रो मन इण दिन सहस्त्र चक्कर में थिर रैवै। इण चक्कर में थिर मन रै लोगां सारू सिध्यां रो दरूजोखुल जावै। इण दिन साधक, तपिया, जपिया अर जोग्यां रा मन काळी माता रै मन में बिराजै। माता काळका भगतां रा दुख मेटै। सुख बधावै। दुष्टां रो खैनास करै। गिरै-गोचर री भिच्च यां दूर करै। माताजी रा साधक डरमुगत होय भंवै।
बंगाल में काळी माता री पूजा रा न्यारा ठरका। बंगाल रै घर-घर में काळी पूजा होवै। बठै री परापर में काळी पूजा री ठावी ठोड। मिंदरां में आरत्यां गूंजै। माताजी रै सरूप नै माटी सूं बणावै। भांत-भांत सूं सजावै। लूंठी-लूंठी देवळ्यां री सोभा-जातरा काढै। बंगालवासी जे बंगाल सूं बारै होवै तो इण दिनां पाछा बावड़ै। पाछो बावडंनो जे दौरो होवै तो जठै रैवै बठै ई काळी पूजा करै। राजस्थान में रैवणियां बंगाली चावना अर ध्यावना सूं काळी पूजा करै।

आठवों नोरतो
दुरगा अष्टमी री धिराणी महागौरी


  माता दुरगाजी रो आठवों रूप महागौरी। आप रो रूप जबर गोरो। आप रो पैराण भी गोरो। धोळा गाभा। आपरी उमर आठ बरस री मानीजै। दुरगा अष्टमी री धिराणी महागौरी। आपरै च्यार हाथ। जीवणै पासै रै एक हाथ में तिरसूळ। दूजो हाथ वरदान देवण री छिब में। डावै पासै रै एक हाथ में डमरू। दूजो हाथ डर भगावण री छिब में। महागौरी री सवारी बळद। आपरी पूजा सूं तुरता-फुरत अर ठावा फळ मिलै। फळ पण अचूक अर बिना मांग्यां मिलै। इणां री ध्यावणां सूं पापां रो हरभांत सूं कल्याण होवै। भगतां रा पुरबला पाप मिटै। आगोतर सुधरै। परलै लोक री सिध्यां मिलै। जका भगत दूजां नै टाळ फगत महागौरी नै ध्यावै, वांरा मनोरथ फळै। इंछाफळ मिलै।
महागौरी पूजा आठ्यूं नै होवै। इण दिन ध्यावणिया वरत करै। आठ्यूं नै कढाई भी बणै। कढाई में रंधै सीरो। सीरै रो माताजी रै भोग लागै। आखै दिन श्री दुर्गा-सप्तसती रो पाठ होवै। इण दिन कुंवारी छोर्यां री पूजा होवै। कन्यावां नै कंजका रूप पुजीजै। पग धोय जीमाईजै। चूनड़ी-गाभा अर दखणा भेंटीजै।

 नोवों नोरतो
अष्ठसिद्धि अर नवनिधि री दाती सिद्धिदात्री

माता जी रो नोवों सरूप सिद्धिदात्री। संसार में नव निध्यां अर अष्ठ सिध्यां बजै। आं नै देवण आळी माताजी सिद्धिदात्री। निध्यां अर सिध्यां री भंडार। सामरथवाण। आद देव स्यो भी सिध्यां बपरावण सारू आं री सरण गया।
जगजामण मात भवानी सिद्धि दात्री रै च्यार हाथ। जीवणै हाथां में गदा अर चक्कर। डावै हाथां में पदम अर शंख। सिर माथै सोनै रो मुगट। गळै में धोळै फूंलां री माळा धारै। कमल पुहुप आसन। इणी कारण एक नांव कमलासना। मात भगवती सिद्धिदात्री री ध्यावना सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, देवता, असुर अर माणस सगळा करै। नौवैं नोरतै आं री खास पूजा। खास अराधना। नौंवै, नोरतै री पूजा होवै। नूंत जीमाईजै। दान-दखणां देईजै। इण कारण ओ दिन कुमारी पूजा रो दिन बजै। जपियां, तपियां, हठियां, जोधावां, छतर्यां अर जोग्यां री साधना फळै। मनवांछत फळ मिलै। अलभ लभै। भगतां में सो कीं करण री सहज सगती संचरै।

रामनमी सांवटै पूरबलां रा पाप


आज ई श्रीरामनमी भी। आज रै ई दिन पुनरवसु नखत में भगवान विष्णु आयोध्या में राजा दशरथ अर माता कौशल्या रै घरां श्रीराम रूप औतार लियो। श्रीराम औतार रो दिन होवण रै पाण ई आज रो दिन रामनमी। आज रै दिन विष्णु भगवान रा भगत विष्णुजी नै धोकै। बरत करै। खास पूजा करै। इण दिन झांझरकै ई संपाड़ा कर पूजा सारू ढूकै। घर रै उतराधै पसवाड़ै पूजा मंडप बणावै। ऊगतै पासै शंख, चक्कर अर हनुमानजी री थापना करै। दिखणादै बाण, सारंग, धनख अर गरूड़जी। पच्छम में गदा, खड़ग अर अंगदजी। उतराधै पदम, साथियो अर नीलजी थरपै। बिचाळै च्यार हाथ री बणावै वेदका। वेदका माथै सोवणां-मोवणा गोखड़ा अर तोरण सजावै। इण मोवणै मंडप में श्रीराम री थापना करीजै। कपूर अर घी रो दीयो चेतन करै। दीयै में एक, पांच या इग्यारा बाट धरीजै। थाळी में धूप अगर, चनण, कमल पुहुप, रोळी-मोळी, सुपारी, चावळ, केसर अर अंतर धर'र आरती करीजै। आखै दिन श्रीरामचरितमानस रा अखंड पाठ चलै। आठ्यूं-नोमी भेळी होयां विष्णु भगत बरत दस्यूं नै खोलै। मानता कै रामनमी रो बरत-पूजा करणिया पुरबला पापां सूं मुगत होवै। सगळै जलमां रा पाप सांवटीजै। भगतां नै विष्णु लोक में परमपद मिलै।
आज छेकड़लो नोरतो। इणी दिन नोरतां री महापूजा। काल दस्यूं। दस्यूं नै पूजा-पाठ करणियां नै दान-दखणां देय बिदा करीजै। राजस्थान रै सगळै देवी मिंदरां में नो दिनां ताणी देवी री पूजा होई।

जै माताजी री !

म्हारी मायड भाषा रा दूहा

म्हारी मायड भाषा रा दूहा

राजस्थानी भाषा




राज बणाया राजव्यां,भाषा थरपी ज्यान ।
बिन भाषा रै भायला,क्यां रो राजस्थान ॥१॥

रोटी-बेटी आपणी,भाषा अर बोवार ।
राजस्थानी है भाई,आडो क्यूं दरबार ॥२॥

राजस्थानी रै साथ में,जनम मरण रो सीर ।
बिन भाषा रै भायला,कुत्तिया खावै खीर ।।३॥

पंचायत तो मोकळी,पंच बैठिया मून ।
बिन भाषा रै भायला,च्यारूं कूंटां सून ॥४॥

भलो बणायो बाप जी,गूंगो राजस्थान ।
बिन भाषा रै प्रांत तो,बिन देवळ रो थान॥५॥

आजादी रै बाद सूं,मून है राजस्थान ।
अपरोगी भाषा अठै,कूकर खुलै जुबान ॥६॥

राजस्थान सिरमोड है,मायड भाषा मान ।
दोनां माथै गरब है,दोनां साथै शान ॥७॥

बाजर पाकै खेत में,भाषा पाकै हेत ।
दोनां रै छूट्यां पछै,हाथां आवै रेत ॥८॥

निज भाषा सूं हेत नीं,पर भाषा सूं हेत ।
जग में हांसी होयसी,सिर में पड्सी रेत ॥९॥

निज री भाषा होंवतां,पर भाषा सूं प्रीत ।
ऐडै कुळघातियां रो ,जग में कुण सो मीत ॥१०॥

घर दफ़्तर अर बारनै,निज भाषा ई बोल ।
मायड भाषा रै बिना,डांगर जितनो मोल ॥११॥

मायड भाषा नीं तजै,डांगर-पंछी-कीट ।
माणस भाषा क्यूं तजै, इतरा क्यूं है ढीट ॥१२॥

मायड भाषा रै बिना,देस हुवै परदेस ।
आप तो अबोला फ़िरै,दूजा खोसै केस ॥१३॥

भाषा निज री बोलियो,पर भाषा नै छोड ।
पर भाषा बोलै जका,बै पाखंडी मोड ॥१४॥

मायड भाषा भली घणी, ज्यूं व्है मीठी खांड ।
पर भाषा नै बोलता,जाबक दीखै भांड ॥१५॥

जिण धरती पर बास है,भाषा उण री बोल ।
भाषा साथ मान है , भाषा लारै मोल ॥१६॥

मायड भाषा बेलियो,निज रो है सनमान ।
पर भाषा नै बोल कर,क्यूं गमाओ शान ॥१७॥

राजस्थानी भाषा नै,जितरो मिलसी मान ।
आन-बान अर शान सूं,निखरसी राजस्थान ॥१८॥

धन कमायां नीं मिलै,बो सांचो सनमान ।
मायड भाषा रै बिना,लूंठा खोसै कान ॥१९॥

म्हे तो भाया मांगस्यां,सणै मान सनमान ।
राजस्थानी भाषा में,हसतो-बसतो रजथान ॥२०॥

निज भाषा नै छोड कर,पर भाषा अपणाय ।
ऐडै पूतां नै देख ,मायड भौम लजाय ॥२१॥

भाषा आपणी शान है,भाषा ही है मान ।
भाषा रै ई कारणै,बोलां राजस्थान ॥२२॥

मायड भाषा मोवणी,ज्यूं मोत्यां रो हार ।
बिन भाषा रै भायला,सूनो लागै थार ॥२३॥

जिण धरती पर जळमियो,भाषा उण री बोल ।
मायड भाषा छोड कर, मती गमाओ डोळ ॥२४॥

हिन्दी म्हारो काळजियो,राजस्थानी स ज्यान ।
आं दोन्यूं भाषा बिना,रै’सी कठै पिछाण ॥२५॥

राजस्थानी भाषा है,राजस्थान रै साथ ।
पेट आपणा नीं पळै,पर भाषा रै हाथ ॥२६॥

सवाल आपणा अजब-गजब

सवाल आपणा अजब-गजब-ओम पुरोहित 'कागद'
जठै जकी भासा में भणाई हुवै बठै उणीज भासा में ग्यान-विग्यान अर गणित हुवै। कोई भासा खुरण ढूकै तो उणरो व्याकरण, ग्यान-विग्यान अर गणित भी सांवटीजण लागै। आपणै देस में संस्कृत भासा बौवार में नीं रैयी तो वैदिक गणित अर ज्योतिर्विग्यान भी अदीठ हुयग्या। आजादी सूं पै'ली राजस्थान री रियासतां में भणाई राजस्थानी भासा में होवती। उण घड़ी गणित, विग्यान, सामाजिक ग्यान, इतिहास आद सगळा राजस्थानी में होवता। अंग्रेज आया तो भणाई में पच्छम री रेळपेळ होयगी। आजादी पछै तो जाबक ई बदळाव आयग्यो। पण बूढै-बडेरां री जुबान माथै हाल मुहारणी-पावड़ा तिरै। टाबरां नै रमावता-बिलमावता ऐ डैण आज भी बिसरी बातां सुणावै। टाबरां नै बुलावै- 'पन्दरै ऐकै पन्दरै, पन्दरै दूणा तीस। तिंयाड़ा-पैंताळा, चौकां साठ। पांज पिचेतर, छक्कड़ा नब्बै। सत्त पिचड़ोत्तर, अट्ठां बीसे। नब्बड़ पैंतीसे, पंदरा दहाया डोढ सै!'
गिणती-पहाड़ां री राग सुणनजोग हुवै। राग में गायोडा पहाड़ा चटकै ई कंठां हुवै। टाबरां सूं कटवां पहाड़ा पूछै, 'बताओ किसै पहाड़ै में तीनूं भाई एकसा?' टाबरां री बोली बंद। तो खुद ई बतावै डोकरो, सैंतीस रै पहाड़ै में एका, दूवा अर तीया एक सा भाई हुवै। सैंतीस तीया एक सौ इग्यारा (१११), सैंतीस छक्का दोय सौ बाईस (२२२) अर सैंतीस नौका तीन सौ तैंतीस (३३३)। पण अब कुण याद करै सैंतीस तक रा पहाड़ा। पाव, आधो, पूणो, सवायो, डोढो, ढूंचो तक रा पहाड़ां री रागां न्यारी-निरवाळी। राजस्थान री पौसाळां सूं राजस्थानी भासा अळगी होयी तो ऐ रागां भी जावती रैयी। अब री भणाई जूना लोगां रै अर जूनी पढाई आज रै टाबरां रै भेजै को ढूकै नीं। राजस्थानी रो गणित तो और भी निरवाळो। कटवां पहाड़ा अर कटवां गिणती रा जोड। अल-जबर, अकल-चरख अर लीलावती रा सवाल। अल-जबर में बीज गणित रा सवाल हुवै। अल-जबर स्यात अंग्रेजी आळो 'एलजेबरा' ई है। अल-जबर रा दोय सवाल आपरी निजर-
()
आधी रोकड़ ब्याज में, चौथाई बाजार।
हंसा-पांती सौळवां, पोतै पांच हजार।।
(२)
आधी पड़ी कीचड़ में, नवों भाग सींवार।
बावन गज बारणै पड़ी, कैवो सिल्ला विस्तार।।
इणी भांत अकल-चरख रा सवाल है। आं सवालां नै सुणतां अकल चरखै चढ़ जावै। ऊथळो ढूंढण में भोडकी भुंवाळी खावण लागै। दोय सवाल देखो-
()
एक लुगाई पांच सेर सूत लेय'र हाट माथै गई। परचूणियै सूं बोली, म्हनै पांच सेर सूत सट्टै पांच सेर परचूण इण भांत देयद्यो-
सूत सवाई सूंठ दे, आधी दे अजवाण।
घिरत बराबर तोल दे, दूणो दे मीठाण।।
()
एकर री बात। सौदागर री नार दरपण में मूंढो देख हार पैर्यो। हार दाय नीं आयो। उण हार नै तोड बगायो। हार में आधा अटक्या। सेज में पन्दरा पटक्या। गोदी में रैया चाळीस। पल्लै में रैया सवाया। तीजो भाग पड़्यो भू पर। हिस्सा नौ का पता न लाग्या। गणित सार में जे हो चतर तो बताओ, हा कित्ता मोती?
अकल-चरख रा सवाल तो म्हे अंवेर लिया। ऊथळा पण थे सोधो। कीं भोडकी पाठकां नै भी घुमावणी चाईजै। लीलावती रा कीं सवाल भी अंवेरण लागर्या हां। उडीक करो। आपरै औळै-दोळै जे अकल-चरख, अल-जबरा अर लीलावती रा सवाल लाधै तो अंवेरो अर भेजो।
आओ, छेकड़ में गणित री एक आडी बांचां-
एक घरां घणा बटाऊ आया। मनवार होयी। बेळू, मतलब रात रा जीमण पछै पोढण री बेळ्यां आई। मांचा कमती पड़ग्या। दोय-दोय बटाऊ भेळा सोवै तो एक मांचो बधै। न्यारा-न्यारा सोवै तो एक बटाऊ बधै। बताओ कित्ता मांचा अर कित्ता बटाऊ?
ल्यो, आडी रो पडूत्तर तो बांच ई ल्यो- तीन हा मांचा अर च्यार हा बटाऊ।
आज रो औखांणोकीड़ी संचै तीतर खाय, पापी रो धन परळै जाय।
चींटी संचय करे, तीतर खाए, पापी का धन यों बह जाए।
पापी का धन बुरे कामों ही खर्च होता है।

छम छम करती लोहडी आई

छम छम करती
लोहड़ी आई
-ओम पुरोहित 'कागद'
राजस्थानी धरा उच्छबां री खान। बा'रा म्हीनां उच्छब। देई-देवतां रा। भौमिया-पितरां रा। मौज-मस्ती रा। रीत-प्रीत रा। रुत-कुदरत रा। खेती-बाड़ी रा। रास-रम्मत रा। तिथ-तिंवारां रा। म्हीनै में तीसूं दिन तिंवार। अै तिंवार मिनखाजूण में मस्ती रा रंग भरै। इस्यो ई एक तिंवार, सकरांत रो तिंवार। जिणनै मकर-सक्रांति भी कैवै। सूरज भगवान माघ म्हीनै में धरती रै दिखणाधै अधगोळ सूं उतराधै अधगोळ में आवै। मकर रासि सूं मेळ करै। इणी दिन उतराधै अधगोळ में गरमी सरू हुवै। मानता है कै इणी म्हीनै सूत्या देव जागै। देवै जका देवता। देव सरीखी परकत, मतलब कुदरत मिनखां नै सौरफ री सौगात देवै। ठंड सूं पिंड छु़डावै। गरमी पसारै। फसलां माथै कूंपळां फूटै। फूल आवै। इणी कोड में सकरांत रो तिंवार आखो राजस्थान मनावै।
सुहागणां तिल सकरिया लाडू, घेवर, मोतीचूर रै लाडू माथै रिपिया मैल'र सासू नै परोसै। सासू आसीस देवै। भावज देवर नै घेवर अर जेठ नै जळेबी परोसै। सुहागणां कोई न कोई आखड़ी, मतलब संकळप लेय'र किणी जिन्स रा चवदै नग जेठाणी, देवराणी, नणंद, काकी सासू, भुआ सासू, मासी सासू, मामी सासू, बडिया सासू अर बामणां नै दान करै। सुरजी री पूजा करै। भोजायां सासरै रै टाबरां नै मूंफळ्यां, रेवड़्यां, गज्जक अर तिल सकरिया बांटै। सनातनी पख बतावै कै इण दिन किरसणजी नै मारण सारू कंश लोहिता नांव री राखसणी नै गोकळ भेजी। लोहिता नै किरसणजी खेल-खेल में ई पाधरी करदी। इण घटना री याद में लोहड़ी मनाइजै। सिंधी समाज भी सकरांत सूं एक दिन पै'ली इण तिंवार नै 'लाल लोही' रै मिस मनावै।
राजस्थान अर पंजाब रा आपस में रोटी-बेटी रा नाता। आं नातां साथै संस्कृति अर भाषा रा मेळ-मिलाप होया। इणी रै पांण पंजाब सूं वैसाखी अर लोहड़ी रा तिंवार राजस्थान पूग्या। आज आखै राजस्थान में मकर सक्रांति सूं एक दिन पै'ली लोहड़ी रो तिंवार मनाइजै। लोहड़ी रै दिन, दिनूगै-दिनूगै बास-गळी रा टाबर भेळा होवै। घरां सूं लकड़ी-छाणां मांगै। उछळता-कूदता गावै- ''लोहड़ी-लोहड़ी लकड़ी, जीवै थारी बकरी, बकरी में तोत्तो, जीवै थारो पोत्तो, पोतै री कमाई आई, छम-छम करती लोहड़ी आई।'' लकड़ी-छाणां भेळा कर'र रातनै चौपाळ में लोहड़ी मंगळावै। लोहड़ी री धूणी माथै आखो गांव भेळो हुवै। सिकताव करै। मूंफळी, रेवड़ी, गज्जक अर तिल-सकरिया खावै। लोहड़ी री आग में तिल अरपण करै। पंजाबी लोग-लुगायां गावै- ''आ दलिदर, जा दलिदर, दलिदर दी जड़ चूल्हें पा।'' इणी भांत राजस्थानी लोग बोलै- ''तिल तड़कै, दिन भड़कै।''
पंजाबी री लोककथा है। एक बामण रै कुंवारी कन्या ही। नांव हो सुन्दर-मुन्दरी। बा भोत फूटरी ही। उणनै एक डाकू उठाय'र लेयग्यो। दुल्लै भट्टी नै ठाह पड़ी। दुल्लो भट्टी जको मुसळमान हो। बण बीं कन्या नै डाकू सूं छु़डाई अर एक बामण रै बेटै साथै परणाई। साथै सेर सक्कर भी भेंट करी। इण भलै मिनख नै आज भी लोग याद करै। टाबर दुल्लै भट्टी रा गीत गा-गा'र लोहड़ी सारू बळीतो भेळो करै- ''सुंदर-मुंदरिये...हो, तेरा कौण बिचारा....हो, दुल्ला भट्टी वाळा....हो, दुल्ले धी ब्याही...हो, सेर सक्कर पाई...हो, कु़डी दा लाल पिटारा...हो।''
जिकै पंजाबी घर में नूंवी बीनणी आवै, बीं में न्यारी-निरवाळी लोहड़ी मनावै। बीनणी रै पी'रै सूं मूंफळ्यां, रेवड़्यां, गज्जक, तिलकुट्टा, घेवर, फीणी आवै। लोहड़ी री धूणी माथै बांटीजै। लोहड़ी रा गीत गाईजै। अजकाळै नूंवा लटका-झटका भी बपराईजै। डी.जे. लगाय'र घर रा सगळा जणां नाच-तमासा करै।
आज रो औखांणोनीर निवाणां-धरम ठिकाणां।
नीर ढलान की ओर और धर्म अपनी ठौर।
जल की हिफाजत के लिए उपयुक्त स्थान कुआँ है। उसी प्रकार धर्म या पुण्य भी उचित पात्र और स्थान को देखकर किया जाना चाहिए, अन्यथा उसका फल उलटा हो जाता है।
संसार में प्रत्येक वस्तु के लिए अपनी ठौर निर्धारित है।

बोल्यां है मिणियां,

बोल्यां है मिणियां,
माळा राजस्थानी
-ओम पुरोहित 'कागद'
नदियां रै जळ सूं ई समंदर भरीजै। भरियो समंदर ई सोवणो लागै। बिना जळ तो समंदर एक दरड़ो। मोटो समंदर बो ईज। जकै में घणी नदियां मिलै। भासा भी समंदर होवै। बोलियां होवै नदियां। बा ईज भासा लूंठी जकी में घणी बोलियां। आ बात बतावै भासा विग्यानी। आपरी निजर है कीं भासा तणी बोलियां। उड़िया-24, बंगाली-15, पंजाबी-29, गुजराती-27, नेपाली-6, तमिल-22, तेलगु-36, कन्नड़-32, मलयालम-14, मराठी-65, कोंकणी-16, हिन्दी-43, अंग्रेजी-57 अर आपणी राजस्थानी में 73 बोलियां। अब बताओ दिखांण कुणसी भासा लूंठी? किणी भासा रो सबदकोस बोलियां रै सबदां री भेळप सूं सामरथवान बणै। जकी भासा में बोलियां कम। उणरो सबदकोस छोटो। आपणी मायड़भासा राजस्थानी रो सबदकोस दुनिया रो सै सूं मोटो। राजस्थानी भासा में एक एक सबद रा 500-500 पर्यायवाची। एक सबद रा इत्ता पर्यायवाची किणी भासा में नीं लाधै। भासा विग्यानी जार्ज ग्रियर्सन 'लिग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' में, डॉ. एल.पी. टेस्सीटोरी 'इंडियन एंटीक्यूवेरी' में अर डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी 'पुराणी राजस्थानी' में राजस्थानी नै दुनिया में सैसूं बेसी ठरकै आळी भासा बताई है।
हरेक भासा में बोलियां होवै। एक भासा मुख सुख सूं बोलीजै। एक भासा बोली री ओळ में बोलीजै। पण अकादमिक भासा रो ठरको न्यारो। हिन्दी तो घणा ई लोग बोलै। हरेक री हिन्दी न्यारी-न्यारी। पण भणाई में पूरै देस री एक ई हिन्दी। जकी में पोथ्यां छपै। बा हिन्दी एक। आपणै पड़ोसी पंजाब नै ल्यो। पंजाब री राजभासा पंजाबी। पंजाबी में पटियाळवी, दोआबी, होशियारपुरी, मलवई, मांझी, निहंगी, भटियाणी, पोवाधि, राठी, गुरमुखी, सरायकी आद 29 बोलियां। पण बठै जका राजकाज रा दफ्तरी हुकम, अखबार-पत्रिकावां अर भणाई री पोथ्यां निकळै, बै एक इज भासा में निकळै। बा है मानक पंजाबी। राज रा हुकम सूं ई किणी भासा रो मानक थरपीजै। इकसार कायदो बणै। जकै दिन आपणी राजस्थानी राजकाज री भासा थरपीजसी। उण दिन मानक राजस्थानी भी थरपीजसी। सगळै दफ्तरां, अखबारां, पत्रिकावां अर पोसाळां री पोथ्यां में एक ई भासा चालसी। बा होसी मानक राजस्थानी। जद तक ओ काम नीं होवै, बठै तक लोग आप-आपरी बोली में लिखै। इण में हरज भी नीं है। अब देखो, पंजाब रै हर अंचल में न्यारी-न्यारी बोलियां बोलीजै। पण विधानसभा, कोट-कचे़ड्यां, पोसाळां, जगत-पोसाळां अर अखबार-पत्रिकावां में राज री थरपियोड़ी मानक पंजाबी ई बपराइजै। पंजाब रै भी हरेक लेखक री भासा में उणरै अंचल री महक भी आयबो करै। आवणी जरूरी है। इणसूं भासा रो फुटरापो बधै। आपणै राजस्थानी लेखकां री भासा में भी आपरै अंचल रो लहजो झलकबो करै। आपां हरेक अंचल री भासा रो सवाद चाखां। तो ठाठ ई न्यारा। बगीचै री सोभा भांत-भंतीला फूलां सूं ई बध्या करै। एक ई रंग-सुगंध रा फूलां रो किस्यो मजो।
राजस्थानी में भी मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाती, वागड़ी, हाड़ोती, भीली, ब्रज अर मारवाड़ी समेत 73 बोलियां। आं सगळी बोलियां नै भेळ'र ई राजस्थानी भासा बणै। जकी भासा में जित्ती बेसी बोलियां, बित्ता ई क्रिया रूप। क्रिया विशेषण, कारक। विशेषण पर्यायवाची होया करै। हिन्दी में 'है' होवै, पण राजस्थानी में 'है', 'सै', 'छै', 'छ' आद कई रूप। हिन्दी में आपां कैवां- आपका। पण राजस्थानी में आपरो, आपनो, आपजो अर आपगो मिलै। राजस्थानी में कई जग्यां 'स' नै 'ह' बोलै। जियां साग नै हाग। सूतळी नै हूतळी। सीसी नै हीही। सासू नै हाहू। सात नै हात। अर सीरै नै हीरो। कोलायत सूं जैसलमेर तक री पट्टी नै मगरो कैवै। ल्यो मगरै री बात बताऊं। दोय मगरेची बंतळ करै-
-होनिया, हुणै है कांई?
-हां, हूणूं हूं नीं, हैंग बातां।
-होनिया यार, हाहू नै हौ बोरी हक्कर होमवार नै भेजणी है। बोरी हीड़ दे नीं। लै हूवो-हूतळी।
-हूं बी हरहूं रै तेल री हो हीही हूहरै नै भेजणी है। म्हनै तो ओहाण ई नीं।
अर अबार सुणो जनकवि कन्हैयालालजी सेठिया री कविता री ओळ्यां-
मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, वागड़ी, हाड़ोती मरुवाणी,
सगळां स्यूं रळ बणी जकी बा, भासा राजस्थानी।
रवै भरतपुर अलवर अलघा, आ सोचो यांताणी!
हिन्दी री मा सखी बिरज री, भासा राजस्थानी।
जनपद री बोल्यां है मिणियां, माळा राजस्थानी।
आज रो औखांणोबोलै ज्यांरा बिकै बूमड़ा*, नींतर जवार पड़ी खोखा खाय।
बोले जिसके बिकें बूमड़े, नहीं तो ज्वार पड़ी रह जाय।
वाचाल व्यक्ति केवल अपनी जीभ के जोर पर बेइंतहा लाभ उठाता है, वरना चुप रहने वालों का अच्छा माल भी बिन बिका पड़ा रहता है।
*अनाज के ऊपर वाले छिलके।

राजस्थानी गांव

सुरगां सूं भी सोवणा,

राजस्थानी गांव।

-ओम पुरोहित 'कागद'

खे़डा फोगां खेजड़ां, चोखा-चोखा नांव।
सुरगां सूं भी सोवणा, राजस्थानी गांव।।
राजस्थानी संस्कृति जूनी। जूनी पण जतनां ताण। जतन सांवठा। सगळां नै सिकार। सगळां रै मनभावणा। जतनां री रिछपाळ। संस्कृति नै अंगेजण री चावना-भावना अर ध्यावना। इणी मठौठ रै पांण, आज भी जींवता ऐ जूना ऐनांण। जूण रै हर खेतर में संस्कृति री सौरम। संस्कृति रा दीठाव। खानपान हुवै या रैवास। मिंदर-देवरा हुवै या मै'ल-मा'ळिया-झूंपड़ा। ढाणी-गांव हुवै या स्हैर-परगना। सगळां में सस्कृति रा चितराम। गांव रो नांव लेवतां ई इतिहास अंगड़ाई तोडतो लखावै। गांव रो बसाव इतिहासू। इतिहास पण नांव में। आओ, आपां जाणां गांव-स्हैर अर परगनां री थरपणा रो इतिहासू मनोविग्यान।
राजस्थान रा गांवां रै नामकरण में इतिहास रो घणो महत्त। घणी'क बार धरा-धणी रै नांव सूं गांव बसै। कई बार किणी कुटुम्ब-धणी रै नांव सूं बसी ढाणी ई गांव बणै। गांव-रिछपाळ रै नांव सूं भी गांवां रा नांव थरपीजै। ठाडा-ठावा वीर, रणबंका, जूझार, राजा अर राणी रै नांव सूं गांव। चाकर-ठाकर, दास-दासी, गुमासता, पगेरू, जीवजंत, चारण, देई-देवता, भोमिया, गढ़, तळाब अर रूंखां रा नांव सूं भी गांवां रा नांव थरपीजै। पण इण थरपणा रै लारै इतिहास री औळ रैवै।
राजस्थान में ढाणी बसावण री जूनी परापरी। गांव अळगो हुवण रै कारण खेतीखड़ लोग आपरै खेत में ढाणी बसावता। धीरै-धीरै कड़ूम्बो बधतो। लाणो-बाणो पसरतो। बधतां-बधतां ढाणी गांव बण ज्यांवती। ढाणी रो नांव धरा-धणी रै नांव सूं या चलबल आळै बडेरै रै नांव सूं राखीजतो। जियां बलवीरसिंह री ढाणी, नंदराम री ढाणी, सवाईसिंह री ढाणी, खेतैआळी ढाणी। एक ई जात रै लोगां री भेळप में बसायोडी ढाणी रो नांव जातिसूचक होंवतो। जियां कै बामणां री ढाणी, खातियां री ढाणी, सारणां री ढाणी, चारणां री ढाणी, खोथांवाळी ढाणी, अराइयां वाळी ढाणी। ढाणी सूं गांव बण्यां पछै ढाणी सबद हट जावतो। जियां कै भगवानसर, धांधूसर, सुरजनसर, शेरगढ़, बामणवाळी आद। गांव रै नांव री थरपणां में भी इतिहास। जको गांव किणी तळाब रै कांठै बसै, उणरै नांव रै छेकड़ में 'सर' लागै। 'सर' आपणी भासा में तळाव रो पर्याय है। आप गीत सुण्यो हुसी- 'सरवर पाणीड़ै नै जाऊं सा, निजर लग जाय।'
इतिहास पुरख या पूजनीक, जूझार, रणबंका, राजा, राणी, आद रै नांव सूं गांव बसाइजतो तो पैली बठै तळाव खुदाइजतो। पछै थरपीजतो गांव रो नांव। बीकानेर रै राजा लूणकरणसिंह रै नांव माथै लूणकरणसर। कवि-चाकर राजिया रै नांव सूं राजियासर। राव अरजनसिंह रै नांव सूं अरजनसर। राणी मळकी रै नांव सूं मळकीसर। राणी केसरदे रै नांव माथै केसरदेसर। निहालदे रै नांव सूं निहालदेसर। कोडमदे रै नांव सूं कोडमदेसर।
इयां ई आपणै औळै-दौळै देखां तो लाधसी- टीडियासर, भोजासर, लिखमीसर, पाबूसर, सालासर, तोळियासर, करणीसर। देई-देवतावां अर संतां रै नांव माथै- गुगाणो, गोरखाणो, गुगामे़डी, बालाजी, नागणेची, रामदेवरा, पाबूसर। रूंखां रै नांव माथै- फोगां, खेजड़ां, खेजड़ली, कीकरवाळी, नीमलो, जाळवाळी, कैरांवाळी, रोहिड़ांवाळी। पसु-पांख्यां रै नांव माथै- बुगलांवाळी, हिरणांवाळी, मिरगलो।
आपां माथापच्ची करां तो आ फड़द घणी लाम्बी बण सकै। आप जागरुक पाठक हो। आ खेचळ करो देखांण। पसु-पांखी, रूंख, देई-देवता, जात, रणबंकां, जुझारुआं आद रै नांव सूं थरपीज्योडा गांवां री न्यारी-निरवाळी फड़द बणाओ।
गांव रै नांव री थरपणां में इतिहास री एक पुट और देखो। जकै गांव-कस्बै-स्हैर मांय गढ़ बण्योडा हुवै, उणरै नांव रै छेकड़ में 'गढ़' लागै। गढ़ कैवां किलै नै। जियां कै जूनागढ़, लालगढ़, अनूपगढ़, फतेहगढ़, कुम्भलगढ़, सूरतगढ़, सूरजगढ़, मेहरानगढ़, किशनगढ़, चितोडगढ़ अर अजीतगढ़। जका गांव कीं बड़ा हुवै, यानी स्हैर सरीखा, उण गांव रै छेकड़ में 'पुर' या 'नगर' लागै। करणपुर, केसरीसिंहपुर, पदमपुर, बीकमपुर, गंगापुर, सादुलपुर, श्रीगंगानगर इणरा उदाहरण है।

आज रो औखांणो
ऊजड़ खे़डा भल बसै, निरधनियां धन होय।
गियो न जोबन बावड़ै, मूवो न जीवै कोय।।
उजड़ा हुआ गांव फिर बस जाता है, निर्धन के पास धन होना भी सम्भव है, लेकिन बीता हुआ यौवन लौट कर नहीं आता और न ही मरा हुआ इंसान फिर से जीवित होता। उम्र का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। हर क्षण अमूल्य है।
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