कागद राजस्थानी

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

सोचण बैठी भेड

बिरखा बरसी मोकळी , पाणीं च्यारूं मेर । 
बाजर बळग्यो खेत में , बादळ काढ्यो बैर ।। 
दाळां मूंघी मोकळी, कांदा चढ्या अकास । 
चटणीं रोटी छूटगी , अब खावां के घास ।।
टूम सरीसो प्याजियो , आवै कोनीं हाथ ।
बींटी घड़ल्यां सांतरी, हीरा मोती साथ ।।
लोकर लेवां बैंक में ,उण में धरद्‌यां प्याज ।
जुरत मुजब जा सूंघल्यां,समझो भायां राज ।।
मिरच मसाला टाळगै, छमकां कूकर साग ।
मूंघी बेजां गैसड़ी , बाळां कूकर आग ।।
रिपियो गुड़कै रोज रो , नेता जी रै भांत ।
जावै गुड़क विदेस में, नेता जी रै स्यांत ।।
लोकराज रै कुंड में , देखो कित्ती तरेड़ ।
पाणी कूकर ढाबस्यां, सोचण बैठी भेड ।

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