कागद राजस्थानी

सोमवार, 8 अगस्त 2011

बिरखा रा दूहा

*बिरखा*

बरसो मत नां बादळां ,बरस्यां दुख है भोत ।
साजन सोवै खेत में , म्हानै आवै मौत ।। 
टूटी फूटी झूंपड़ी , चौवै च्यारुं मेर ।
कितसी ढाळूं ढोलियो, बिरखा काढै बैर ।।
 
टप टप टोपा तन पड़ै, पिंडै लागै लाय ।
साजन भंवै आंतरा, बादळ दै सिळगाय ।।
 
गांव बिचाळै टापरी, आंगण साम्हीं पोळ ।
संग नहावै सायबो , बरस्यां बिगड़ै डोळ ।।
 
छम छम बरस्या बादळा, टप टप चौई छात ।
साजन ढाबै छात नै, आंख्या थमगी रात ।।
सावण बरस्या बादळा, साजन आया याद ।
बातां पुरसै फोनड़ै,आसी सावण बाद ।।
 
रेलां बणगी सोतणां , साजन लेगी साथ ।
बिरखा बरसै सांतरी , गौरी मसळै हाथ ।।
 
छाती छोलै छांटड़्यां , मोर चिगावै भोत ।
बिरखा थारै कारणैं, उघड़ै म्हारा पोत ।।
 
मेह उजाळी खेजड़्यां, माटी बदळ्या रंग ।
काया म्हारी पांगरै, साजन होयां संग ।।
 
धरती भीजी मेह में , हरिया काढ्या पान ।
म्हैँ भी भीजी मेह मेँ, म्हारी बिगड़ी तान ।।

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