कागद राजस्थानी

सोमवार, 8 अगस्त 2011

ऊंदी कविता


*ऊंदी कविता*
 
हाथी चकगै कीड़ी चाली।
धरती चकगै कूऐ घाली।।
 
मांचो माणस माथै सोवै ।
.आटो फैँकै छाणस पोवै ।।
 
मोटर माथै सड़कां चालै।
नै'रां माथै धरती चालै ।।
 
सुपनां मेँ अब नींदां आवै।
मा नै गोदी पूत रमावै ।।
 
नळको पाणीं नीचै न्हावै ।
फळ धरती रै नीचै आवै ।।
 
रोटी खा गी माणस सारा ।
पाणीँ पीग्या कूआ सारा ।
 
कुलफी खा गी घोचो सारी ।
बातां मिलगै सोचो सारी ।।

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