कागद राजस्थानी

मंगलवार, 31 मई 2011

नोरता : नो देव्यां रा रूप

नोरता : नो देव्यां रा रूप

          -ओम पुरोहित कागद



पैलो नोरतो -सैलपुत्री पैलां सिरै



नोरता नौ देवियां रा रूप। देवी सगती री नौ रातां अर नौ दिन। देवी अर रातां एकूकार। इणी नौ दिनां में महालक्ष्मी परगटाई नौ देवियां। इणी नौ देवियां नै नवदुरगा बखाणीजै। नोरतां रै नौ दिनां अर नौ रातां में इणीज नव दुरगा री ध्यावना होवै। श्री लक्ष्मणदान कविया(खैण-नागौर) रचित दुरगा सतसई में नव दुरगा री विगत-

सैलपुत्री पैला सिरै, ब्रह्माचारिणी दुवाय।
तीजी चंद्रघंटा'र चव, कुषमांडा कहवाय।।
स्कंध माता पांचवीं, कात्यायनी छटीज।
कालरात्रि सातमी, महागौरी अस्टमीज।।
नवौ नांव दुरगा तणौ, सिद्धदात्री संसार।
प्रतिपादित बिरमा किया, सहजग जाणणहार।।

नवदुरगा में पैली दुरगा सैलपुत्री। मां भागोती रो पैलो सरूप। परबतराज हिमवान री लाडेसर बेटी। सैल नाम परबत रो। इणी कारण नांव थरपीज्यौ सैलपुत्री। सैलजा भी इण रो नांव। सैलपुत्री री सुवारी बळद। इण रै डावै हाथ में तिरसूळ। जीवणै हाथ में मनमोहणो कमल पुहुप। सिर माथै सोनै रो मुगट अर आधो चंद्रमां। पैलड़ै जलम में राजा दक्ष री कन्या रूप में जलमी। उण जलम में नांव पण सती। उण जलम आप घोर तप करियो। भगवान शिव नै राजी कर वर रूप में हांसल करियौ। पण दक्ष नै बेटी री आ बात नीं जंची। उणां शिव नै सती रै वर रूप में अणदेखी करी। सती नै आ बात अणखावणी ढूकी। सती रा बापू सा एकर जिग करियौ। सती रा वर शिव री अणदेखी करी। सती नै आ बात दाय नीं आई। बै रिसाणी होय'र बापू सा रै जिग-कुंड में बळ परी भस्म होयगी। उणां भळै हिमालय री कन्या रूप में दूजो जलम लियो। भळै तप करियो अर पाछी भगवान शंकर री अधडील बणी। उणां नै मनमुजम शंकर भगवान वर रूप में मिल्या।
सैलपुत्री नै मिली मनवाछिंत सिद्धि। इणरै पाण बै मनसां पूर्ण हुई। मनसां पूरण सारू लोग उणां नै हाल ताणी धौके-ध्यावै। घोर तपियां अनै जपियां नै दुरगा रो सैलपुत्री रूप घणौ भावै। जोगी सैलपुत्री नै ध्यावै। आं नै पड़तख राख जोग करै। जोग करतां मन नै मूळ आधार में थिर करै। इणरी ध्यावना सूं जोग्यां रा जोग जमै। तपियां रा तप सधै। जपियां रा जप फळै। जोग रा संजोग बैठै। जोग साधना री मूळ थरपीजै। नोरता पूजन रै पैलै दिन सैलपुत्री री उपासना सूं मन मुजब इंच्छा पूरण होवै। जग जामण मां दुरगा री पूजा में हर दिन मां रा सिणगार करीजै। हर दिन पण निरवाळा सिणगार। पैलै नोरतै में माता रा केश संस्कार करीजै। इण दिन माता जी री देवळ नै द्रव्य-आवंळा, सुगधिंत तेल भेंटीजै। केश संवारिजै। केश सवांरण री जिन्सां भेंटीजै। आखै दिन एकत राखीजै अर दुरगा सप्तसती रा पाठ करीजै।

 दूजो नोरतो
धीरज धिराणी ब्रह्माचारिणी


नवदुरगा रा नव रूप निराळा। हर रूप मनमोवणो -मनभावणो। रूपां री पण छिब निरवाळी। ऐड़ी ही निरवाळी छिब मात ब्रह्माचारिणी री। जग जामण महालक्ष्मी ब्रह्माचारिणी नै दूजी देवी रूप परगटाई। बह्मा सबद रो मतलब तप। ब्र्रह्माचारिणी घोर तप अर धीरज री धिराणी। आं में तप री सगति अपरम्पार। आं रै तप नै नीं कोई लख सकै, नीं लग सकै। चारिणी सबद रो मतलब चालण आळी। यानी तप रै गैंलां चालण आळी। घोर तप रै गैलां चालण रै कारण नांव थरपीज्यो ब्रह्माचारिणी। इण नावं सूं जग चावी। बडा-बडा रिखी-मुनि, जोगी, सिद्ध, ग्यानी-ध्यानी, तपिया-जपिया अर हठिया भी आं रो तप देख'र चकरी चढ्या। आंख्यां तिरवाळा खायगी।
ब्रह्माचारिणी रो रूप भव्य। लिलाड़ माथै तप रो ओज। आं रो सरूप जोता-जोत। जोतिर्मय। डावै हाथ में कमडंळ। जीवणै हाथ में जप माळा। सिर माथै सोनै रै मुगट री सोभा निरवाळी। नोरतां रै दूजै दिन इणी मां दुरगा री पूजा हौवै। उपासना करीजै। मां दुरगा रो सुरंगो रूप भगता नै भावै। आं री ध्यावना सूं भगतां, सिद्धां, जोग्यां, ध्यान्यां, तपियां अर जपियां रा मनोरथ पूरीजै। भगतां- सिद्धां नै अखूट-अकूंत फळै ब्रह्माचारिणी रा दरसण। धीरज-धिराणी ब्रह्माचारिणी री ध्यावना मिनखां में धीरज बपरावै। मिनखां में त्याग,वैराग्य अर धीरज रो बधैपो करै। इण री किरपा चौगड़दै। चौगड़दै सिद्धि। चारूकूंट विजय दिरावण वाळी। धीरज धिराणी बह्माचारिणी मिनखां में सदाचार अर संयम बगसावै। जोग्यां नै जोग सारू तेडै जोग-साधक दूजै दिन आपरै मन नै स्वाधिष्ठान चक्र में थिर करै। इण चकर में थिर मन माथै ब्रह्माचारिणी री किरपा बरसै। ऐडो साधक देवी री किरपा अर भगति नै पूगै।
नोरतां रै दूजै दिन मां दुरगा री खास पूजा होवै। इण दिन माता रा केस गूंथीजै। बाळ बांधीजै। चोटी में रेसमी सूत का फीतो बांधीजै। माता रै बाळां री सावळ संभाळ करीजै। लगो-लग श्री दुरगा सप्त्सती अर मारकण्डेय पुराण पाठ करीजै। एकत पण चालतौ रैवै। आज रो बरत नोरतै रो दूजौ बरत बजै।

तीजो नोरतो
मस्तक घंटा धारिणी चंद्रघण्टा


तीजै नोरतै री मैमा न्यारी। ध्यावै जगती सारी। तीजो नोरतौ जगजामण मात रै तीजै सरूप चंद्रघण्टा रै नांव। मात चंद्रघण्टा रै मस्तक माथै घण्टैमान चंद्रमा बिराजै। चंद्रमा मस्तक माथै सौभा पावै। इणी कारण माताजी रो तीजो सरूप चंद्रघण्टा। मात चंद्रघण्टा दस हाथ धारै। जीवणै पसवाड़ै रा पांच हाथ अभय दिरावण री छिब में। सरीर सोनै वरणो। एक हाथ में कमल। दूजै में धनुख। तीजै में बाण। चौथै में माळा। पांचवौ हाथ आसीस में उठियो थको। माताजी रै डावै हाथां में भी अस्तर। एक हाथ में कमण्डळ। दूजै में खड़ग। तीजै में गदा। चौथै में तिरसूळ। अर एक हाथ वायुमुद्रा में। चंद्रघण्टा रै शेर री सवारी। कंठा पुहुपहार। कानां सोनै रा गैणा। सिर सोनै रो मुगट। चंद्रघण्टा दुष्टां रो खैनास करण नै उंतावळी। दुष्टदमण सारू हरमेस त्यार। मानता कै चंद्रघण्टा नै ध्यावणियां शेर री भांत लूंठा पराकरमी अर भव में डर-मुगत भंवै। मात चंद्रघण्टा आपरै भगतां नै भुगती अर मुगती दोन्यूं एकै साथै देवै। मन-वचन-करम अर निरमळ हो विधि-विधान सूं चंद्रघण्टा रै सरणै आय जकौ ध्यावै उण नै मन-माफक वरदान मिलै। ऐड़ा भगत सांसारिक कष्टां सूं मुगत होय परमपद ढूकै। तीजै नोरतै री खास बात। इण नोरतै में माताजी नै खुद रो फुटरापो गोखाईजै। इण दिन उणां नै आरसी में मुंडो दिखाईजै। इणीज दिन माता जी नै सिंदूर भेंटीजै।

गणगौर पूजा

नोरतै रै तीजै दिन यानी चैत रै चानण पख री तीज नै गौरी-शंकर री पूजा होवै। गौरी मात जगदम्बा यानी पार्वती। पार्वती रा धणी शंकर। इण दिन आं दोन्यां री पूजा ईसर-गणगौर रै रूप में होवै।

चौथो नोरतो
मधरी-मधरी मुळकै कूष्माण्डा

 चौथै नोरतै री धिराणी कूष्माण्डा माता। कूष्माण्डा कैवै कूम्हड़ै अर पेठै नै। ब्रह्मांड पैठै-कुम्हड़ैमान। इणी कूष्माण्डामान ब्रह्मांड री सिरजणहार माता कूष्माण्डा। दुरागाजी रै इणी चौथै सरूप रो नांव कूष्माण्डा माता। कूष्माण्डा री मधरी-मधरी मुळक। इणी मधरी मुळक सूं अण्ड अर ब्रह्मांड नै सिरज्या। अण्ड अर ब्रह्मांड री सिरजणां रै पैटै दुरगा रै इण सरूप नै कैवै कूष्माण्डा माता। ब्रह्मांड री सिरजणहार होवण रै पाण ई आप सिरस्टी री आद-सगत। आप रै सरीर रो तप-औज सुरजी मान पळपळावै। कूष्माण्डा माता रै आठ हाथ। इणी पाण आप अष्टभुजा देवी भी बखाणीजै। आप रै जीवणै पसवाड़ै रै च्यार हाथां में कमण्डळ, धनुख, बाण अर कमल बिराजै। डावै हाथां में इमरत कळस, जपमाळा, गदा अर च कर साम्भै। सीस सोनै रो मुगट। कानां सोनै रा गैणां। शेर री सवारी। कूष्माण्डा माता री ध्यावना सूं भगतां रा सगळा संताप मिटै। रोग-सोग समूळ हटै। उमर, जस, बळ अर निरोगता बधै।
चौथै नोरतै में साधक रो मन अनाहज चक्र में बास करै। इण सारू माणस नै निरमळ मन सूं कूष्माण्डा माता री ध्यावना करणी चाइजै। माताजी रा जप-तप अर ध्यावना भगत नै भवसागर पार उतारै। माणस री व्याध्यां रो मूळनास होवै। दुख भाजै। सुख रा डेरा जमै। इण लोक अर आगोतर री जूण सुधारण सारू कूष्माण्डा माता री ध्यावना करीजै।

 पांचवों नोरतो
कार्तिकेय जननी स्कन्द माता

पांचवैं नोरतै री धिराणी स्कंद माता। स्कन्द माता दुरगाजी रो पांचवों सरूप। स्कन्द रो एक नांव कार्तिकेय भी। कार्तिकेय पण माताजी रो लाडेसर बेटो। कार्तिकेय री जामण होवण रै कारण ई इण सरूप रो नांव स्कन्द माता। देवतावां रै बैरी तारकासुर नै स्कन्द माता जमलोक पुगायो। माताजी रै च्यार हाथ। जीवणै पसवाड़ै रै एक हाथ सूं आपरै लाडेसर नै गोद्यां बैठाय'र झालियोड़ो दूजै हाथ में कमल पुहुप। डावै पसवाड़ै रै एक हाथ में आसीस छिब। दूजै हाथ में भळै कमल पुहुप। सिर माथै सोनै रो मुगट बिराजै। कानां में सोनै रा गैणा। सिंघ री सवारी। स्कन्द माता संसार्यां नै मोख दिरावै। ध्यावणियां भगतां री मनस्यावां पूरै। पांचवै नोरतै में ध्यावणिया जोग्यां रो मन विशुद्ध चक्र में थिर रैवै। इण कारण ध्यावणियां रै मनबारै री अनै भीतरली चित्त वरत्यां रो लोप हो जावै। पांचवै नोरतै नै साधक माताजी रै अंगराग अर चनण रा लेप करै। भांत-भांत रा गैणा-गांठा पैरावै।

लिछमी पांच्यूं

आज लिछमी पांच्यूं भी। लिछमी भी माताजी रो एक सरूप। लिछमीजी कमल आसन माथै विराजै। कमल मतलब पदम। इण सारू आप रो एक नांव पदमासना भी। बिणज-बौवार करणियां नैं माताजी रो ओ रूप डाडो भावै। ऐ लोग माताजी रै लिछमी रूप नै ध्यावै। बिणज अर धन रै बधेपै री कामना करै। माताजी बां रा मनोरथ पूरै।

खाता उल्टा पल्टी रो दिन


बिणज-बोपार में आज रो दिन रोकड़ खाता पल्टी रो। वित्तीय लेखा बरस रो पैलो दिन। इण दिन बोपारी हिसाब फळावै। लेण-देण चुकावै। तळपट मिलावै। आपरै बिणज री बईयां बदळै। रोकड़, खाता अर चौपड़ी पलटै। लेण-देण री खतोन्यां खतावै। नूवीं बईयां री पूजा करै। नूवीं रोकड़, खाता अर चौपड़ी रै पैलै पानै माथै 'गणेशाय नम:' लिखै। रोळी सूं साथियौ (साखियौ) मांडै। उण माथै पान-सुपारी, रोळी-मोळी अर फळ-प्रसाद चढावै। दूजै पानै माथै लिखै- 'लिछमीजी महाराज सदा सहाय छै। लाभ मोकळा देसी।' इणी माथै लिछमी सरूप 'श्री' इण भांत लिखै-


                                                   श्री  
                                               श्री श्री
                                             श्री श्री श्री
 ॥ शुभ  ॥                          श्री श्री श्री श्री                             ॥  लाभ॥
                                       श्री श्री श्री श्री श्री
                                     श्री श्री श्री श्री श्री श्री
                                  श्री श्री श्री श्री श्री श्री श्री


इण रै असवाड़ै-पसवाड़ै 'शुभ-लाभ' अर 'रिद्धि-सिद्धि' लिखै। रोळी कूं-कूं चिरचै। चावळ भेंटै। नूंई लेखणी-कलम-कोरणी बपरावै। इण माथै भी मोळी बांधै। अब पण लोगड़ा कम्प्यूटर-लेपटाप बपरावै तो इण जूंनी परापर नै कठै ठोड़!

छठो नोरतो
लाडकंवरी कात्यायनी


दुरगा रै कात्यायनी सरूप रै निमत। माता कात्यायनी महारिखी कात्यायन रै घरां लाडकंवरी रूप जाई। इणी कारण नांव थरपीज्यो कात्यायनी। महारिखी कात्यायन दुरगाजी री ध्यावना करी। जप-तप कर्यो। इणी रै पेटै कात्यायनी आसोज रै अंधार पख री चवदस नै उणां रै घरां जलम लियो। जलम रै बाद आसोज रै चानण पख री सात्यूं , आठ्यूं अर नौम्यूं नै महारिखी री पूजा सीकारी। दसमी नै भैंसासुर नै सुरगां रै गैलां घाल्यो। इण रो बखाण लक्ष्मणदान कविया आपरी दुरगा सतसई में इण भांत करियो-

उछळी देवी कैय आ, चढी दैत रै माथ।
दबा परौ पग भार सूं, सूर वार कंठाथ।।
पगां भार दाबियौ थकौ, मुखां निकळ नव भाव।
ठमग्यौ आधौ निकळ नै, देवी तणै प्रभाव।।
अरध निकळियौ जुध करै, देवी सूं म्हादैत।
बडखग सूं सिर काटियौ, देव भलाई हेत।।
सेन मझां मचियौ जबर, असुरां हाहाकार।
सेना सगळी भाजगी, देवां हरख अपार।।


माता कात्यायनी रो सरूप सोवणौ अनै मनमोवणौ। आं रै च्यार हाथ। जीवणै पसवाड़ै रै एक हाथ में खड़ग। दूजै में पोयण(कमल) रो पुहुप। सिंघ आपरी सुवारी। सिर माथै पळपळाट करतो सौनै रो मुगट सौभा बधावै। कात्यायनी माता व्रजमंडळ री अधिष्ठात्री बी बजै। आं री पूजा छठै दिन करीजै। इण दिन माताजी नै पुहुप अर पुहुप-माळा भेंटीजै। ध्यावणियां नै माताजी इंछा फळ देवै। भगतां रा दुख-दाळद मेटै। साधक नै अर्थ, धर्म, काम, मोख सगळा भेळै ई सौरफ सूं मिलै। आज रै दिन ध्यावना करणियै रो मन आज्ञा चक्र में थिर रैवै। जोग साधना में आज्ञा चक्र री ठावी ठोड़ अणूती मैमा। इण चक्र में थिर मन रो भगत माता जी रै चरणां में सो कीं निछरावळ कर देवै। भगत नै पड़तख माताजी रा दरसण होवै। आं नै ध्यावणिया इण लोक में रैवतां थकां आलोकिक तेज राखै।

जमनाजी रो जलम दिन


आज जमनाजी रो जलम दिन भी है। यमुना जंयती। सूरज भगवान रै घरां आज रै ई दिन जमनाजी जलम्या। आज नोरतै रै साथै-साथै जमनाजी री भी पूजा होवै। लुगायां जमनाजी री कथा सुणै। सूरज महातपी। प्रजापति विश्वकरमा सुरजी नै आपरी बेटी संज्ञा रै वर लायक मान्यो। संज्ञा रो ब्यांव सुरजी साथै कर दियो। संज्ञा रै तीन औळाद होई। दो छोरा अर एक छोरी। छोरां रा नांव मनु अर यम। छोरी रो नांव यमुना। आपणी भाषा में कैवां जमना। जमनाजी भी तपी-जपी। भगतां रा दुख-दाळद मेटै। पाप मुगत करै। जको जमनांजी में न्हावै। ध्यावै। उण नै जमनाजी रा भाई जमराज नीं संतावै।

सातवों नोरतो
सदा सुब करै काळी माता

माता दुरगाजी रो काळरात सरूप। माताजी रै इण रूप नै काळी माता अर काळी माई बखाणीजै। कालरात्रि पण आपरो नांव। इण माताजी रो डील अंधारैमान काळो। सिर रा बाळ खिंडायोडा। गळै में बीजळी दाईं चमकती माळा। काळी माता रै तीन आंख्यां। नासां री सुंसाड सागै अगन री लपटां निसरै। आं री सुवारी गधे़डो। काळी माता रै च्यार हाथ। जीवणै पासै रो ऐक हाथ डरमुगत करण री अर दूजो हाथ वरदान देवण री छिब में। डावै पासै रै ऐक हाथ में लो' रो कांटो अर दूजै हाथ में तरवार। काळी माता रो सरूप देखण में जबर डरावणो। विकराळ। ऐ माता जी पण हरमेस भला फळ देवण आळी। हरमेस सुब-सुब ई करै। इण कारण इणां नै शुभंकरी भी कैईजै।
काळी माता नै घोर जपिया जपै। तपिया तपै। जादूगर इण माताजी रा लूंठा भगत। इंदरजाळ अर काळो जादू सीखण आळा काळी माता नै ध्यावै। लोगड़ा आपरै टाबरां नै उपरळी बीमारयां सूं बचावण रै मिस धोकै। भूत-प्रेत, टूणा-टसमण अर लाग-बांध नै टाळण सारू काळी माता नै ध्यावै। काळी माता री पूजा सात्यूं नै करीजै। इण दिन माताजी री पूजा घर रै बिचाळै करीजै। जोग्यां अर साधकां रो मन इण दिन सहस्त्र चक्कर में थिर रैवै। इण चक्कर में थिर मन रै लोगां सारू सिध्यां रो दरूजोखुल जावै। इण दिन साधक, तपिया, जपिया अर जोग्यां रा मन काळी माता रै मन में बिराजै। माता काळका भगतां रा दुख मेटै। सुख बधावै। दुष्टां रो खैनास करै। गिरै-गोचर री भिच्च यां दूर करै। माताजी रा साधक डरमुगत होय भंवै।
बंगाल में काळी माता री पूजा रा न्यारा ठरका। बंगाल रै घर-घर में काळी पूजा होवै। बठै री परापर में काळी पूजा री ठावी ठोड। मिंदरां में आरत्यां गूंजै। माताजी रै सरूप नै माटी सूं बणावै। भांत-भांत सूं सजावै। लूंठी-लूंठी देवळ्यां री सोभा-जातरा काढै। बंगालवासी जे बंगाल सूं बारै होवै तो इण दिनां पाछा बावड़ै। पाछो बावडंनो जे दौरो होवै तो जठै रैवै बठै ई काळी पूजा करै। राजस्थान में रैवणियां बंगाली चावना अर ध्यावना सूं काळी पूजा करै।

आठवों नोरतो
दुरगा अष्टमी री धिराणी महागौरी


  माता दुरगाजी रो आठवों रूप महागौरी। आप रो रूप जबर गोरो। आप रो पैराण भी गोरो। धोळा गाभा। आपरी उमर आठ बरस री मानीजै। दुरगा अष्टमी री धिराणी महागौरी। आपरै च्यार हाथ। जीवणै पासै रै एक हाथ में तिरसूळ। दूजो हाथ वरदान देवण री छिब में। डावै पासै रै एक हाथ में डमरू। दूजो हाथ डर भगावण री छिब में। महागौरी री सवारी बळद। आपरी पूजा सूं तुरता-फुरत अर ठावा फळ मिलै। फळ पण अचूक अर बिना मांग्यां मिलै। इणां री ध्यावणां सूं पापां रो हरभांत सूं कल्याण होवै। भगतां रा पुरबला पाप मिटै। आगोतर सुधरै। परलै लोक री सिध्यां मिलै। जका भगत दूजां नै टाळ फगत महागौरी नै ध्यावै, वांरा मनोरथ फळै। इंछाफळ मिलै।
महागौरी पूजा आठ्यूं नै होवै। इण दिन ध्यावणिया वरत करै। आठ्यूं नै कढाई भी बणै। कढाई में रंधै सीरो। सीरै रो माताजी रै भोग लागै। आखै दिन श्री दुर्गा-सप्तसती रो पाठ होवै। इण दिन कुंवारी छोर्यां री पूजा होवै। कन्यावां नै कंजका रूप पुजीजै। पग धोय जीमाईजै। चूनड़ी-गाभा अर दखणा भेंटीजै।

 नोवों नोरतो
अष्ठसिद्धि अर नवनिधि री दाती सिद्धिदात्री

माता जी रो नोवों सरूप सिद्धिदात्री। संसार में नव निध्यां अर अष्ठ सिध्यां बजै। आं नै देवण आळी माताजी सिद्धिदात्री। निध्यां अर सिध्यां री भंडार। सामरथवाण। आद देव स्यो भी सिध्यां बपरावण सारू आं री सरण गया।
जगजामण मात भवानी सिद्धि दात्री रै च्यार हाथ। जीवणै हाथां में गदा अर चक्कर। डावै हाथां में पदम अर शंख। सिर माथै सोनै रो मुगट। गळै में धोळै फूंलां री माळा धारै। कमल पुहुप आसन। इणी कारण एक नांव कमलासना। मात भगवती सिद्धिदात्री री ध्यावना सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, देवता, असुर अर माणस सगळा करै। नौवैं नोरतै आं री खास पूजा। खास अराधना। नौंवै, नोरतै री पूजा होवै। नूंत जीमाईजै। दान-दखणां देईजै। इण कारण ओ दिन कुमारी पूजा रो दिन बजै। जपियां, तपियां, हठियां, जोधावां, छतर्यां अर जोग्यां री साधना फळै। मनवांछत फळ मिलै। अलभ लभै। भगतां में सो कीं करण री सहज सगती संचरै।

रामनमी सांवटै पूरबलां रा पाप


आज ई श्रीरामनमी भी। आज रै ई दिन पुनरवसु नखत में भगवान विष्णु आयोध्या में राजा दशरथ अर माता कौशल्या रै घरां श्रीराम रूप औतार लियो। श्रीराम औतार रो दिन होवण रै पाण ई आज रो दिन रामनमी। आज रै दिन विष्णु भगवान रा भगत विष्णुजी नै धोकै। बरत करै। खास पूजा करै। इण दिन झांझरकै ई संपाड़ा कर पूजा सारू ढूकै। घर रै उतराधै पसवाड़ै पूजा मंडप बणावै। ऊगतै पासै शंख, चक्कर अर हनुमानजी री थापना करै। दिखणादै बाण, सारंग, धनख अर गरूड़जी। पच्छम में गदा, खड़ग अर अंगदजी। उतराधै पदम, साथियो अर नीलजी थरपै। बिचाळै च्यार हाथ री बणावै वेदका। वेदका माथै सोवणां-मोवणा गोखड़ा अर तोरण सजावै। इण मोवणै मंडप में श्रीराम री थापना करीजै। कपूर अर घी रो दीयो चेतन करै। दीयै में एक, पांच या इग्यारा बाट धरीजै। थाळी में धूप अगर, चनण, कमल पुहुप, रोळी-मोळी, सुपारी, चावळ, केसर अर अंतर धर'र आरती करीजै। आखै दिन श्रीरामचरितमानस रा अखंड पाठ चलै। आठ्यूं-नोमी भेळी होयां विष्णु भगत बरत दस्यूं नै खोलै। मानता कै रामनमी रो बरत-पूजा करणिया पुरबला पापां सूं मुगत होवै। सगळै जलमां रा पाप सांवटीजै। भगतां नै विष्णु लोक में परमपद मिलै।
आज छेकड़लो नोरतो। इणी दिन नोरतां री महापूजा। काल दस्यूं। दस्यूं नै पूजा-पाठ करणियां नै दान-दखणां देय बिदा करीजै। राजस्थान रै सगळै देवी मिंदरां में नो दिनां ताणी देवी री पूजा होई।

जै माताजी री !

1 टिप्पणी:

  1. खूब अच्हो लिख्या हो पुरोहित जी मजा आयग्य बड़ो जी ने सुकून मिलियो पढर जै माँ दुर्गा

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