कागद राजस्थानी

शनिवार, 21 जनवरी 2012

एक कविता

प्रीत

प्रीत पांगळी 
चालै हळवां
पकड़ आंगळी
कथी अलेखूं
मथी कहाणीं
निकळी कूड़
पूगी भागती
फगत ऐकली
पगां उभाणीं ।

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

बैबी हैप्पी कोलेज,हनुमानगढ़ जंक्शन खानीं सूं सम्मान


राजस्थानी लोक संस्थान,नोहर खानीं सूं सम्मान


महाकवि कन्हैया लाल सेठिया मायड़ भाषा सम्मान:छोटी खाटू



पंचलडी़ री "माणक" में समीक्षा


रविवार, 18 सितंबर 2011

ताज़ी कवितावां

*बम बम कुदेव*
 
देस मेँ अब
देवां रो नीं
कुदेवां रो बास्सो है
... अब हर हर री जाग्यां
डर डर उच्चारिजै ।
दिल्ली भी अब
बिल्लीबारी होयगी
इणीज कारण
चौगड़दै ऊंदरा थड़ी करै
बै तो अब
दरबार ताणीँ ढूकग्या
अर दरबारी
इणी डर मेँ सूकग्या !
नेतावां रा गाभा
धोळा ई हा
अब तो डील भी
धोळा होग्या
पै'ली सुणता कोनी हा
पण अब बोळा होग्या !
 
 
*म्हे अर बै*
 
[1]
म्हे तो
बरसां खाई कोनीं
... धाप'र रोटी
अर बै खाग्या
म्हारी बोटी-बोटी !
[2]
म्हे
घालता रैया बोट
अर
बै छापता रैया नोट
म्हारै पल्लै आज
साल दर साल है
बोट ई बोट
अर बांरै पल्लै
अकरा अकरा नोट !
[] ढब बादळ []

जा रै डोफा बादळ
कदै ई इयां ई
... बरस्या करै
बरसा बरसा पाणीं
थूं तो ले लियो
मिनख रो पाणीं
फिरै बापड़ो
अब गाणीँ माणीं !

टपकती टपकती
छेकड़ टपक ई गई
भींता बिचाळै छात
भींतां लुळी
उठावण नै
पण पसरगी
आंगणैं मेँ
सूंएं बिचाळै छात !

ढब !
अब ढब बादळ
भीँत चिणावां
उठावां छात
बणावां बात
थारै तांईं
आगै सारु !

हिन्दी राष्ट्र भाषा नहीं-अखबारों में देखो

  
  
 -: अठै भी बांचो :-
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5498466.cms


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