कागद राजस्थानी

शनिवार, 3 सितंबर 2011

्ताजा कविता

 ताजी कविता
[] ढब बादळ []

जा रै डोफा बादळ
कदै ई इयां ई
...बरस्या करै
बरसा बरसा पाणीं
थूं तो ले लियो
मिनख रो पाणीं
फिरै बापड़ो
अब गाणीँ माणीं !

टपकती टपकती
छेकड़ टपक ई गई
भींता बिचाळै छात
भींतां लुळी
उठावण नै
पण पसरगी
आंगणैं मेँ
सूंएं बिचाळै छात !

ढब !
अब ढब बादळ
भीँत चिणावां
उठावां छात
बणावां बात
थारै तांईं
आगै सारु !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.