कागद राजस्थानी

रविवार, 18 सितंबर 2011

ताज़ी कवितावां

*बम बम कुदेव*
 
देस मेँ अब
देवां रो नीं
कुदेवां रो बास्सो है
... अब हर हर री जाग्यां
डर डर उच्चारिजै ।
दिल्ली भी अब
बिल्लीबारी होयगी
इणीज कारण
चौगड़दै ऊंदरा थड़ी करै
बै तो अब
दरबार ताणीँ ढूकग्या
अर दरबारी
इणी डर मेँ सूकग्या !
नेतावां रा गाभा
धोळा ई हा
अब तो डील भी
धोळा होग्या
पै'ली सुणता कोनी हा
पण अब बोळा होग्या !
 
 
*म्हे अर बै*
 
[1]
म्हे तो
बरसां खाई कोनीं
... धाप'र रोटी
अर बै खाग्या
म्हारी बोटी-बोटी !
[2]
म्हे
घालता रैया बोट
अर
बै छापता रैया नोट
म्हारै पल्लै आज
साल दर साल है
बोट ई बोट
अर बांरै पल्लै
अकरा अकरा नोट !
[] ढब बादळ []

जा रै डोफा बादळ
कदै ई इयां ई
... बरस्या करै
बरसा बरसा पाणीं
थूं तो ले लियो
मिनख रो पाणीं
फिरै बापड़ो
अब गाणीँ माणीं !

टपकती टपकती
छेकड़ टपक ई गई
भींता बिचाळै छात
भींतां लुळी
उठावण नै
पण पसरगी
आंगणैं मेँ
सूंएं बिचाळै छात !

ढब !
अब ढब बादळ
भीँत चिणावां
उठावां छात
बणावां बात
थारै तांईं
आगै सारु !

2 टिप्‍पणियां:

  1. aaj tharo blog dekhyo.
    saravan ro jee kare pan, kain karun mha hindi may koni likh paun hoon.the salah de sako to theek hai.

    उत्तर देंहटाएं
  2. यह सम्मान की बात हे की आपको "श्री छोटी-खाटू हिंदी पुस्तकालय" द्वारा २०११ का महा कवी कन्हैया लाल सेठिया मायड़ भाषा सम्मान दिया जायेगा |
    मेने आपके बारे में थोडा यंहा लिखा हे ,मार्गदर्शन के लिए पधारे |
    http://vijaypalkurdiya.blogspot.com/2011/10/blog-post.html

    उत्तर देंहटाएं

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