कागद राजस्थानी

बुधवार, 15 जून 2011

गरमी रा दूहा


धरती तपगी सुरजड़ा


















धरती तपगी सुरजड़ा, कोजी थारी आंच ।
चिड़ी कागला तड़फड़ै,खोलै कीकर चांच ।1।


पान फूल सै झुळसिया, गयो मिनखड़ो हार ।
नभ थळ पाणी चूसियो, मुरधर सेवै मार ।2।

सीवण बूई फोगड़ा,मुरधर रो सिणगार ।
सगळा नै तू झपटिया, बैठी मनड़ो मार ।3।

ऐक बिचारी खेजड़ी, डटी सामने आय ।
मुरधर लागी काळजै,जीया जूण बचाय ।4।

बादळ थारो भायलो, मुरधर रो भरतार ।
बेगो नीचै भेजदे, मानांला करतार । 5 ।

रूंख तिसाया आथिया, गया बापड़ा सूक ।
मोर नाचणां भूलिया, कोयल भूली कूक ।6।

काछबा बण्या टोपसी, सुरजी थारै ताप ।
आप कमावै बावळा,बिरम हित्या रो पाप |7।

आभै थारो राज है, धरती ताणीँ मार ।
मुरधर नै तूं बगसदे,क्यांनै खावै खार ।8।

बाळू आवै उठ परी , थारो करै सतकार ।
कण कण इण रो भेयदे, कर बूंदां बोछार ।9।



1 टिप्पणी:

  1. बोत ई आछी लागी आ कविता. इनमे सैन कीं हैं आ कविता साची में म्हने बोत भाई सा ! राजस्थानी भासा अ'र साहित्य सारू आपरो सांतारो परयास पूजणीय है सा.

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