कागद राजस्थानी

बुधवार, 1 जून 2011

अपने बच्चों की जुबान

         अपने बच्चों की जुबान काटकर

    राष्ट्र के चरणों में रखी राजस्थानियों ने 

                                 -ओम पुरोहित’कागद’





राजस्थानी भाषी लोग जब भी अपनी मातृभाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने अथवा प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा राजस्थानी में देने की गुहार करते हैं, तो न जाने क्यों गैर राजस्थानी भाषी चिंतित हो जाते हैं। जबकि राजस्थान में उनकी संख्या नगण्य है। बंगाल, आसाम, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व गुजरात आदि प्रान्तों में रहने वाला राजस्थानी भाषी वहां कभी प्रतिकार करता नजर नहीं आता। सर्वविदित है कि बंगाल, आसाम, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व गुजरात में राजस्थानी भाषियों का संख्या बल कम नहीं है। राजस्थानी भाषी जहां भी रहता है, वहां प्रतिकार नहीं करता, अपितु वहां समरस हो जाता है। यह बात राजस्थान में रहने वाले गैर राजस्थानी भाषियों ने आज तक नहीं सीखी। इन लोगों की जो भी मातृभाषा है, उसका हम सम्मान करते हैं। उनकी भाषा से प्रान्त में हमारा कोई विरोध नहीं है। वे अपनी मातृभाषा के हित में बात करें। हम उनके साथ हैं, मगर इस कीमत पर नहीं कि हम अपनी मातृभाषा को भाषा ही न मानें और आठवीं अनुसूची में शामिल करने का विचार छोड़ दें। राजस्थानी भाषा को भाषा न मानने वाले व इसको आठवीं अनुसूची में शामिल करने का विरोध करने वाले वे मुट्ठी भर लोग हैं, जिनके पूर्वजों को राजस्थान के रजवाड़ों ने अपने यहां हिन्दी के प्रचार-प्रसार के निमित्त सम्मान से बुलवाया था। उस समय हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने का जिम्मा रजवाड़ों ने आगे बढ़कर उठाया था। उस काल में राजस्थान के समस्त रजवाडों में राजकाज, शिक्षा, पट्टे, परवाने, हुण्डी आदि सब राजस्थानी भाषा में होते थे। इसके प्रमाण राजस्थानी के प्राचीन ग्रंथागारों-संग्रहालयों में देखे जा सकते हैं।
अन्य प्रदेशों से आए हिन्दी के विद्वानों व अध्यापकों ने जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, अजमेर, उदयपुर, चित्तौड़, भरतपुर, डूंगरपुर, धौलपुर, बांसवाड़ा, नागौर आदि में डेरे डाले व राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया तथा विद्यालयों में हिन्दी की शिक्षा दी। तब तक इन समस्त रजवाड़ों में राजस्थानी भाषा में ही पढ़ाया जाता था। इन विद्वानों को रजवाड़ों ने भूमि के पट्टे, ताम्रपत्र, मंदिर-माफी की भूमि के परवाने दिए, जो आज भी इन विद्वानों के घरों में देखे जा सकते हैं। ये विद्वान जिन घरों में बैठते हैं, यदि वे घर रियासत काल के हैं तो उनके पट्टे पढ़ लें। उसमें मिल जाएगी राजस्थानी भाषा।
आजादी के बाद जब भाषा के आधार पर प्रान्त बने तो अन्य भाषाई प्रान्तों की तरह राजस्थानी भाषा के आधार पर हमारा राजस्थान बना। उस समय प्रान्तीय भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया जाने लगा। मराठी, तमिल, तेलुगु, उडिय़ा, मलयालम, गुजराती, कश्मीरी, पंजाबी, उर्दू आदि भाषाएं प्रान्तीय भाषाएं बनीं तो हमारे तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं को हिन्दी सिमटती नजर आई। उन्होंने राजस्थान के नेताओं से अपील की कि आप कुछ वर्ष रुक जाओ। जब हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित हो जाएगी जब राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में डालकर राज्य की द्वितीय राजभाषा बना दी जाएगी।
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास व महात्मा गांधी तथा पूर्व गृहमंत्री सरदार पटेल के बीच बनी इस सहमति का समूचा राष्ट्र, भारतीय संसद, हिन्दी के तत्कालीन तमाम विद्वान गवाह हैं। आज भी हिन्दी साहित्य इतिहास के तटस्थ विद्वान इस बात को स्वीकार करते हैं। इस बात को भलीभांति समझना है तो हिन्दी के आदिकाल को पढ़ें। जहां 12 में से 10 ग्रंथ राजस्थानी भाषा के हैं। राजस्थान में आकर प्रचार-प्रसार करने वाले विद्वानों का राजस्थानियों ने ''पधारो म्हारै देश" की सनातन परम्परा के अनुसार स्वागत किया। इतिहास गवाह है कि विरोध की एक भी चिंगारी किसी भी रजवाड़े में कभी भी नहीं उठी। आजादी के 63 वर्ष बाद जब राजस्थानी अपनी मातृभाषा वापिस मांग रहे हैं तो उन्हीं बाहरी विद्वानों के वंशजों के पेट में मरोड़े उठ रहे हैं। वे ऊल-जलूल बोल रहे हैं। व्यर्थ प्रलाप कर ऐसे-ऐसे कुतर्क दे रहे हैं, जो भाषा विज्ञान की किसी भी कसौटी पर खरे नहीं उतर सकते। इनकी हिम्मत को दाद देनी पड़ेगी कि वे एलपी तैस्सीतोरी, सुनीति कुमार चटर्जी, ग्रियर्सन, टैगोर, गांधी, नेहरू, पटेल व नामवर सिंह के मनन को नकार रहे हैं। ऐसे लोगों को अपने मकान के पट्टे, कृषि भूमि के कागजात, मंदिर-मस्जिद की भूमि के पट्टे, ताम्रपत्र देखने चाहिएं। इनमें उन्हें मिल जाएगी राजस्थानी भाषा। इस पर भी भरोसा न हो तो अपने बही भाटों से संपर्क कर पूछें कि उनके पूर्वज राजस्थान क्यूं आए थे?
आज समूचा राजस्थान चाहता है कि उसे अपनी मातृभाषा वापिस मिले। उसके बच्चे अपनी मातृभाषा में शिक्षा संस्कार प्राप्त करें तो सबको आगे बढ़ कर राजस्थानियों का सहयोग करना चाहिए। राजस्थान के अहं पर चोट न करें। इतिहास गवाह है कि राजस्थानी अपनी आन-बान व शान के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। राजस्थान को राजस्थान ही रहने दें। गोरखालैण्ड मत बनाइए। हम महाराणा प्रताप के वंशज हैं। हम अपने अहं को घास की रोटी खाकर भी सुरक्षित रख सकते हैं, पर भाषा नहीं छोड़ेंगे। हम भाषा का मुद्दा शांति व सरलता से हल करना चाहते हैं। क्योंकि हमने राष्ट्रभाषा हिन्दी की स्थापना के लिए अपने कीमती 63 वर्ष खोए हैं। अपने बच्चों की जुबान काटकर राष्ट्र के चरणों में रखी है। अब और त्याग के लिए हमें मत उकसाइए। अब हमारे बच्चों की देह, दान में न मांगें।
अपने इस तर्क को समेट लें कि कौनसी राजस्थानी। आपका दिल जानता है कि कौनसी राजस्थानी है। जिस भाषा में अधिक बोलियां होती हैं वह सबसे बड़ी होती है। ये भाषा वैज्ञानिक कहते हैं। यदि तेलुगु-36, कन्नड़-32, मलयालय-14, मराठी-65, कोंकणी-17, तमिल-22, नेपाली-6, गुजराती-27, पंजाबी-29, बंगाली-15, उडिय़ा-24, अंगेजी-57 व हिन्दी-43 बोलियों के होते हुए भी एक भाषा है, तो तिहेतर बोलियों वाली राजस्थानी इन सबसे समृद्ध भाषा है। ये जेहन में अभी से बैठा लें। यह भी ध्यान रखें भाषाई एकरूपता मान्यता के बाद तय होती है। जैसे हिन्दी में स्थापित की गई है। जिस दिन राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाएगा तो सरकारी स्तर पर स्वत: एकरूपता कायम की जा सकेगी। इसलिए फिलहाल एकरूपता का मुद्दा बेमानी है।

ओम पुरोहित 'कागद'
24 दुर्गा कॉलोनी, हनुमानगढ़ संगम-335512
कानाबाती : 9414380571

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