कागद राजस्थानी

बुधवार, 1 जून 2011

राजस्थानी भाषा-लूंठी भाषा

राजस्थानी भाषा-लूंठी भाषा

१.राजस्थानी भाषा १० करोड राजस्थानियों की भाषा है ।राजस्थानी भाषा बोलने वालों का छेतर र्राजस्थान ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत व विश्व के विभिन्न देशों तक फ़ैला हुआ इसका विस्त्रित छेतर है ।
२.राजस्थानी साहित्य १२ वीं शताब्दि से गद्य व पद्य में निरन्तर लिखा जा रहा है ।
३.१२ वीं शताब्दि से लिखे गये राजस्थानी साहित्य से सम्बन्धित लगभग ४ लाख हस्तलिखित ग्रन्थ रजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिस्ठान में तथा निजी संग्रहों मेंआज भी सुरक्शित हैं ।
४.इस भाषा का लोक सहित्य भी लोक्गीत ,लोकगाथा, लोककथा ,लोकोक्तियों,लोकनाट्य,कहावतों,मुहावरों एवम पहेलियों में सुरक्शित हैं जो विशाल परिमाण मॆ तथा काफ़ी स्म्रिध है । एसा स्म्रिध लोक सहित्य देश की किसी भी भाषा में नहीं है ।
५.राजस्थानी भाषा का शब्द्कोश ४ लाख शब्दों क है,जो विश्व की किसी भी भाषा के राजस्थानी भाषा से बडा है ,एसा व इतना विशाल शब्द्कोश और किसी भी भाषा का नहीं है।उदाहरणार्थ राजस्थानी भाषा में ऊंट शब्द के प्रयाय्वाची शब्द २०० से ज्यादा हैं ।
६.राजस्थानी भाषा में लगभग ५९ तरह के शब्द्कोश पांडुलिप्यों के रूप में सुरक्शित हैन पद्मश्री सीता राम लालस के प्रकाशित शब्दकोशों में लगभग २ लाख शब्द हैं।
७.राजस्थानी साहित्य का प्रारम्भिक लेखन यों तो १० वीं शताब्दि से आरम्भ होता है किन्तु स्वतंत्र एवम विधिवत साहित्य लेखन १२ वीं शताब्दि से मिलने लग्ता है।यह लेखन गद्य व पद्य दोनो में तथा इन दोनो के साहित्यिक रूप भी पद्य मॆं ६० से अधिक तो गद्य में ३० से अधिक विविध रूपों में प्राप्त होता है ।
८.राजस्थानी सहित्य क अपना काव्यशाश्त्र है ,कई तरह के लक्शण ग्रन्थ हैं।अपना छंद विधान,अपना अलंकार शाश्त्र है, भाषा विग्यान की अपनी विशेश्ता है,व्याकरण भी राजस्थानी की निजी विशेश्ताओं से युक्त है ।
९.इस भष में अनुवाद कार्य १७ वीं शताब्दि से होना आराम्भ हो गया था । संस्मरण जैसा आधुनिक लेखन भी १९ वीं शताब्दि में अन्य भाषाओं से पहले आराम्भ हो गया था ।
९.राजस्थानी भाषा में लगभग ४ लाख हस्त्लिखित ग्रन्थ विभिन्न ग्रन्थ भंडारों मे प्रकशन की प्रतीक्शा में पडे हैं। ये पाडुलिपियां हमारे पूर्वजों के संचित ग्यान कए कोश के रूप में है।
१०.इस प्रदेश की संस्क्रिति मानव सभ्यता के ऊषाकाल से अर्थात पाषाणकाल से उपलब्ध होती है जो काफ़ी वैविध्यपूर्ण,स्म्रिध,विस्त्रित एवम मानवीय मूल्यों व मर्यादाओं से औत-प्रौत है।
११.इस भाषा की लिपी भी देवनागरी है जो राष्ट्रभाषा हिन्दी की भी है।अत यह राष्ट्रीय एकता की द्रिस्टि से काफ़ी महत्वपूर्ण है ।
{डा.देव कौठारी,अध्यक्श,राजस्थानी भाषा,सहित्य एवम संस्क्रिति अकादमी,बीकानेर[ अकादमी की पत्रिका "जागती जोत" ,जनवरी-
२००७, पेज -९२ से१०४}

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