कागद राजस्थानी

शनिवार, 21 जनवरी 2012

एक कविता

*सोवां कोनी *
रोवै जका
सोवै कोनीं
सोवै जका
रोवै कोनीं
दुख आळी रात
कद आवै नींद
सुख आळी रात
सोवै कुण !

कुण कैवै
रात सोवण
अर
दिन जागण सारु होवै
भलै मिनखां चितारी
सोवो तो रात है
जागो तो बात है
सूत्यां कटै दिन
जकै में
भेळा होवै दिन-रात !

सूत्यां नै जगावणों पाप है
पाप्यां नै जगावणों महापाप
पण चालो
आपां जगावां सूत्यां नै
बदळां पाप पुन्न रा भेद
मिट्यां भेद आ सी नींद
जकी जगासी जगती नै !

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