कागद राजस्थानी

शनिवार, 21 जनवरी 2012

एक कविता

*जावां कठै*
मत ना पूछो हाल
हाल माड़ा है
जावां कठै
लोरयां रा भाड़ा है
तेल रा खेल
भूंडा अचपळा
रिपड़ा पल्लै कोनीं
तेल घलै कोनीं
फटफटियो चलै कोनीं
राज हाथै बातै नीं
मंडै चंवरी कोनीं
बचै भंवरी कोनीं
करां खटको
लट्टू जगै कोनीं
निरा बिल है
बिलां लारै
नागा नेता नाग है
काळजै निरी आग है
म्हारै कांईं लाग है
पण डरै दिल है
खाली पेटड़ा
पण भरै बिल है
नळ रोवै टोपा टोपा
नेता होग्या गोपी गोपा !

लिखां कविता सुणै कोनीं
सुणै तो गुणै कोनीं
गाभा तो चोखा धोळा है
कानां सूं पण बेजां बोळा है
आं री आंख्या पाटी है
जूण जनता री हळदीघाटी है
धिकावै धाको
लगावै नाको
चुप चाप पड़ी है
बापड़ी रोवै कोनीं
मांगै कोनीं अर पोवै कोनीं !

गांधी बाबो कीलग्यो
भूखा हो तो मारो मत
भूखा मर बिगाड़ो गत
बात तो आ जचै कोनीं
नेता रो कीं बिगड़ै कोनीं
म्हारो कीं बचै कोनीं !

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