कागद राजस्थानी

शनिवार, 21 जनवरी 2012

एक कविता

*चिड़ी बोली*
चिड़ी बोली
कागलै सूं
नीचै उतर
डागळै सूं
चाल चालां रूंख पर
रूंख ई है आपणों घर है
ओ है माणस रो घर
मैं ईं रै भीतर
भोत रैयोड़ी हूं
ओ क्यां रो घर है
ईं रै भीतर तो
डर ई डर है !

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