कागद राजस्थानी

रविवार, 2 जून 2013

*सुपना*


सुपना तो हा
हा पण अंतस में
आंख्यां उतरता
डरता-डरता ई
मरग्या अंतस में ।

आंख्यां उडीकती रैई
कद उतरसी
उणरी पूतळ्यां
म्हांरा सुपना ।

आज
आंख्यां रा काच
मांदा पड़ग्या
पण मांदा नीं पड़्या
अंतस में पड़्या सुपना
नित पांगरै
पण नीं धारै रूप
जिण में दीठै जगती !

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