कागद राजस्थानी

रविवार, 2 जून 2013

*होळी रा सात दूहा*

फागण में लफड़ा घणां , रूं रूं उतरै रंग ।
आंख्यां बैठ्यो ओझको, नींदां साथै जंग ।1।
ओळ्यूं ऊभी सांकड़ै, बाळपणो है संग ।
बां दिनां री बातड़ल्यां, उडगी भेळै रंग ।2।
छैल धमाळां गांवता , छैल बजाता चंग ।
छैला टींगर नाचता, डैण छाणता भंग ।3।
टींगर बणता टींगरी, घूमर घलती जंग ।
कोई रिपिया वारतो, कोई न्हाखतो रंग ।4।
आपां अळगा ऊभता, करता हा हुड़दंग ।
खावण पीवण सांकड़ा, थेथड़ मुंडां रंग ।5।
होळी होगी भायलां, गई जुवानी संग ।
अब तो होळी खेलता, बेजां होवां तंग ।6।
किण नै रंगां बापजी, चढै न कोई रंग ।
काळा कर कर करमड़ा, मुंडा है बदरंग ।7।

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