कागद राजस्थानी

रविवार, 2 जून 2013

नींद आयां आवै

नींद आवै तो आवै
नीं आवै तो नीं आवै
जोरांमरदी तो आवै ई नीं
फेर भलांई कोई 
लोरी गाओ
पंखा हिलाओ
का हिंडा हिंडाओ !

नींद आवै तो
कांकरा ई पथरना
नीं आवै तो
पथरना में ई
कांटा गडै ।

नींद आंख्यां में नीं
अंतस में कठै ई
ऊंडी बसै
जठै सूं आवै निकळ'र
अर कर देवै
मिनख नै चेताचूक
पछै नीं आवै चेतै
ओळाव बिछावणां रा ।

नींद तो
आयां आवै
अंतस सूं टिचकार'र
ल्यावै कुण !

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