कागद राजस्थानी

रविवार, 2 जून 2013

कुचरणीं

घरआळी बोली
म्हैं पीरै बैठी
थांन्नै याद आंवती होऊंली
थांरै सुपणां में भी
रोज रात नै
आंवती होऊंली !

भरतार बोल्यो
म्हैं सोंवती बगत सिराणै
पाणीं रो लोटो
लोहै री कूंची धरूं
थांरी याद कियां आ सकै
जद म्हैं सोवण सूं पैली
हड़मान चाळीसो करूं !

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