कागद राजस्थानी

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

मुंडो सकां न खोल

आक चाबतां बापजी, होया चौसठ साल ।
आम्बा कदसी चूसस्यां, ऊभो ऐक सुआल ।1।
मुंडा म्हारा सील है, बोलां कीकर राज ।
मन री मनड़ै दाबगै , रोवां गूंगा आज ।2।
भाषा थारी कैद में, करो कनीँ आजाद ।
खोलां मन री गांठड़ी, देवां घण लखदाद ।3।
सगळा प्रदेस आपरी , भाषा राखी टाळ ।
म्हारी भाषा मांगतां, क्यूं काढो थे गाळ ।4।
डांगर कांटा कागला , बोलै खुद रा बोल ।
भूंडा म्हारा भाग है , मुंडो सकां न खोल ।5।

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