कागद राजस्थानी

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

गुलफ़ी जमगी नाक में

पाळो लागै कुजरबो , धूजण ढूक्या हाड ।
चावड़ी बिना मावड़ी , कूड़ो लागै लाड ॥
गुलफ़ी जमगी नाक में , बिन घोचै रै आज ।
अदरख आळी चावडी़ , आज बचासी लाज ॥
आज बणा दे गुलगुला , सागै कीं गुळराब ।
जे कीं तळै पकोडि़या , पग देऊंला दाब ॥
फ़ीणी-केसर घालगै , पावो दूध गिलास ।
कंठा उतरै दूधडो़ , बचै बचण री आस ॥
चिट-चिट छोलूं मूंफ़ळी , झट-पट लेऊं चाब ।
बिच-बिच खाऊं रेवडी़ , पूछो मत ना साब॥
मोटी-मोटी सिरखडी़ , गूदडो़ धस्सैदार ।
भीतर बैठ्या तापल्यां , सिगडी़ धूंवैदार ।।
आवै साम्हीं मावडी़ ,ओळ्यूं थांरी डाक ।
धर हाथां में देंवती , बाटकी गूंदपाक ।।

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