कागद राजस्थानी

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

*सतलड़ी*


-रूंखड़ा-


जड़ां छोड्या पिराण रूंखड़ा।
ऊभ्यो किणरै ताण रूंखड़ा।।
तूं तिरसायो कळपी धरती।
आभै में घमसाण रूंखड़ा ।।
छीँयां सटै आज पंछीड़ा ।
भूल्या मीठो गाण रूंखड़ा ।।
थारा पान खोय बायरियो ।
रुळग्यो राणोराण रूंखड़ा ।।
बरसां थारै बांध राखड़ी ।
बळगी बेलां भाण रूंखड़ा ।।
थारी काया मुरधर माया ।
आज रुळै है आण रूंखड़ा ।।
काढ़ पानका दे हरयाळो ।
जीयां थारै पाण रूंखड़ा।।

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