कागद राजस्थानी

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

*ऊंदी कविता*

हाथी चकगै कीड़ी चाली।
धरती चकगै कूऐ घाली।।
मांचो माणस माथै सोवै ।
आटो फैँकै छाणस पोवै ।।
मोटर माथै सड़कां चालै।
नै'रां माथै धरती चालै ।।
सुपनां मेँ अब नींदां आवै।
मा नै गोदी पूत रमावै ।।
नळको पाणीं नीचै न्हावै ।
फळ धरती रै नीचै आवै ।।
रोटी खा गी माणस सारा ।
पाणीँ पीग्या कूआ सारा ।
कुलफी खा गी घोचो सारी ।
बातां मिलगै सोचो सारी ।।

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