कागद राजस्थानी

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

लाय लगावै लूंठिया

छोडा छोलै छोटिया , मोथा मारै मार ।
लाय लगावै लूंठिया , पड़सी कूकर पार ।।
डोका नीरै डावड़ा , जाण सकै तो जाण ।
लारै आं रै लागगै , होसी बेजां हाण ।।
बाबा बणावै बांदरा , राम रटावै रोज ।
खोट खिण्डावै खोड़ला, मिजळा मारै मोज ।।
टमचर फूटै मावड़ी , आज दियाळी साज ।
टाबर कूकै मीठै नै , दिखै न कांदा आज । 
कूकै बैठ गरीबड़ा ,करतां पूजा पाठ ।
खस खस काया होम दी, ठोठ मनावै ठाठ ।
बोखा मांगै बोरिया, दांतल मांगै दाख ।
रोडा मांगै कांगसी , टळै न जतना लाख ।।
मन रा मालक भायलां , कीं तो राखो चींत ।
खुद रो घर जे खोदस्यो ,ऊपर पड़सी भींत ।।
हक रो खावो मोकळो , भरो आपरो पेट ।
पांती खोस गरीब री, क्यूं नोट लगाओ जेट ।।
रात आज री कुजरबी , आवै कोनीं नींद ।
कुण नै घोड़ी पटकसी , कुणसो बणसी बींद ।।
नेता धोकै देवता , चमचा बोलै जात ।
पेट पिलाणां ढूकसां , आप बणाओ बात ।।

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