कागद राजस्थानी

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

मानसूनड़ो

मानसूनड़ो रुळ परो, होग्यो अब सुन्नमान ।
बिरखा कूकर बरससी, कियां निपजसी धान ।1।
धोरी पाळी आसड़ी, टूटै पड़तख आज ।
बिरखा करदे बादळी, मधरी मधरी गाज ।2।
बादळ थारै कारणै , कळपै मुरधर माय ।
बरसादै जे छांटड़ी, कळी कळी खिलजाय ।3।
पाणी साम्यां बादळी, डोलै अंबर जाय ।
लाड लडावां मोकळो,बरसै क्यूं नीँ आय ।4।
आभो छोडो बादळी, बैठो मुरधर आय ।
नित रा लेवां वारना, लेवां गळै लगाय ।5।
बिरखा बरसी बापजी, धरती धारयो धीर ।
जळ थळ होया ऐकसा, धरती पसरयो नीर ।।

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