कागद राजस्थानी

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

. * झपीड़ *

भोळा थारै देवरै , पूजण ढूकी भीड़ ।
किण बातां री रीस में , ऐड़ो दियो झपीड़ ।।
पापी बैठ्या देसड़ै , मरग्या सै निसपाप ।
पापी मरज्यै चूकती , आंख्यां खोलो आप ।।
डूंगर बैठ्या आप तो , ठोको कितरा भोग ।
भूखा मरग्या जातरू , थांरै क्यूं नीं सोग ।।
माणस डूब्या मोकळा, खुर लाधै ना खोज ।
नेता ढूकै झाजड़ां , क्यूं खिंचावै पोज ।।
कितरी तो बैनां गमीं , कितरा गमग्या बीर ।
कितरा घर ऊजाड़िया , बदळी क्यूं तकदीर ।।

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