कागद राजस्थानी

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

लुगाई : सात चितराम

1.
छोरी जित्तै छोरी ही
बित्तै भोत सोरी ही
बणतां ई लुगाई
सगळी आफत आई
छूटी पैलपोत 
उण री जलमभौम
पछै छूट्यो घर
मिल्यो सासरो
जिण में मिल्यो
जणैं-कणैं रो डर ।

जे राखै
आंख्यां नीची
मुंडो बंद
कान खुल्ला तो देवी
अर बड़भागी बजै
आंख मिलावै
मुंडो खोलै
ऊलजलूल री
करै अणसुणी
तो नागी बजै !
.
2.
लुगाई जद ताईं
बेटी ही घर री
तो लाडकंवरी ही
बैन ही तो
सोनळ बाई
भूआ ही तो
भोत स्याणीं
मा बणीं तो
ममता रो खजानों
पण
बणतां ई सासू
थरपीजगी कळै री मूळ
एक लुगाई री
जूण जातरा में
क्यूं पूगै विशेषण
इण मुकाम ?
.
3.
खुद रो घर छोड
ढूकै दूजै रै घर
पछै परोटै बठै
परायां नै आपरा मान
आपरो सो कीं होम
बणैं बा उणां री
छोड'र खुद रो
करै वंसबधेपो
उणां रो ई वंश
चालै आगळी पीढ्यां
जिण री नींव में
चिणीजै लुगाई !

4.
मिनखां जेड़ा ई
आंख-नाक-कान
हाथ-पग अर मुंडा
पण मिनख रै भेजै
लुगाई रा चितराम 
ऊंदा अर भूंडा ! 

कथण नै
घर री स्यान
पण
समझै उण नै
निजू सामान !
.
5.
घर में लुगाई
खींच नीं सकै
किणीं सारू
कोई लीकटी
पण उण नै
चालणों पड़ै
आखी जूण
दूजां री बणाई
लीकटी दर लीकटी ।

मिनख जिका
तोड़ै लीकटी
बै बजै सूर
लुगाई जे तोड़ै
तो बजै नकटी ।
.

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