कागद राजस्थानी

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

रोटी : सात चितराम

रोटी : एक
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रोटी
जुवार-कणक री
मोठ-बाजरी री 
का पछै मक्की री होवो
पेट भरण सारू
रोटी पण हाथ
होवणीं चाईजै ।

रोटी चावै
आंटी-टेढी
मोटी-पतळी
चपटी होवो
होवो चावै
गोळ-मटोळ
होवणीं पण
सुख री चाईजै ।
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रोटी : दोय
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रोटी चावै
होवो लुक्खी ई
होवै पण हक री ई ।

मांग्योड़ी रोटी
भूख तो ढाबै
पण
माजणों दाबै
माजणैं सटै
मिली रोटी
पचै कोनीं
जे पच ई जावै
तो मिनखपणों
बचै कोनीं ।

रोटी : तीन
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रोटी नै
मिनख बणाओ
बणाओ चावै
कोई लुगाई
चावै बणाओ
कोई धरम रो
कोई माणस
पण
रोटी नीं छोडै
आपरो धरम ।

रोटी सारू
मिनख छोड सकै
आपरो धरम
रोटी पण नीं छोडै
रोटी रो धरम
फ़गत एक ई
भूख ढाबणों
छूटै ई कियां
ओ धरम !
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रोटी : च्यार
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पेट में पूग
रोटी टोरै
जूण जातरा
मिनख री
रोटी री त्यागत
फ़गत जीम्यां ई नीं
नीं जीम्यां भी
आवै साम्हीं ।

रोटी जीम्यां चालै
डील-डोळ अर भेजो
रोटी री संकडा़ई
तोडै घर
नाता अर रिस्ता !
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रोटी : पांच
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जद ताईं घर में
बणती रैवै
अर
मिलती रैवै रोटी
राड़ बधैई नीं
चावै फ़ेर होवै
बा कित्ती ई मोटी ।

रोटी ई बधावै
घर-समाज में भेळप
जद कदैई
खूटै रोटी
तो टूटै घर-समाज
टूट ई जावै
बडेरां री साम्भी
सात पीढी री भेळप ।
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रोटी : छऊ
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आगलो जुद्ध
रोटी सारू ई होसी
पकायत ।

बगना है बै
जिका कैवै
आगलो जुद्ध
पाणीं सारू होसी ।

पाणीं सूं भरया है
तिरिया-मिरिया
नदी-नाळा
कूआ-भावडी़
झील-समन्द
पछै हिमाळो ई बैठ्यो है
अखूट पाणीं नै ठसाय
छाती लगाय्जीव-जन्त सारू
बो कद नीवडै़
कद लडै़ मिनख ?

तीजी दुनियां सारू
पाणीं रो घाटो कठै
पण सगळा धाप’र
जीम लेवै रोटी
इत्तो आटो कठै ?

रोटी रो रोळो
नित मंडै
घर-गुवाडी़
आ राड़ तो
छेकड़ बधणीं ई है
छेकड़लै जुद्ध ताईं !


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रोटी : सात
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आज ताईं जे
भाई सूं भाई फ़ंट्यो
नणद सूं भोजाई अंटी
देराणीं-जेठाणीं भिडी़ है
अर घर में मची है कळै
तो इण कळै री मूळ
रोटी पकायत रैई है
आ कळै
चावै होई है

रोटी कमावण
रोटी पुरसण
रोटी खावण
रोटी पोवण सारू
का पछै होई है
रोटी-रोटी रोवण सारू !

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