कागद राजस्थानी

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

*जातरा अर मील भाठा*

मनरळ्यै मीत सूं
मिलण जांवतां 
मन में होवै
कितरी खाथावळ
पगां नै पण नीं होवै
ऐड़ी कोई उंतावळ
पग भाड़ेती मन रा
भाजै मन लारै !

मिलण-बतळावण री
उपड़ती चावना रै
आडा आंवता
मारग रा मील भाठा
डाडा खारा लागै
गिणना ई पड़ै सगळा
मिंडी सूं सरू कर
छेकड़ली मिंडी ताईं ।

कई बार
जावणों पड़ै
ऐड़ी जातरा माथै
जकी रुचै नीं मन नै
ऐड़ी घड़ी
कित्ता बेगा नीवड़ै
मारग रा मील भाठा
एक नीवड़ै नीं
दूजो झट आ ढूकै !

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